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शनिवार, 14 जुलाई 2012

... बदल गई हैं परिभाषाएँ - पूरन सिंह


  • पूरन सिंह ने हमें तकरीबन पाँच छः लघुकथाएँ मेल की थी इनमें एक को छोड़कर लगभग सभी दलित लघुकथाएँ थी। इससे पहले हमने आप के साथ उनकी लघुकथा 'भूत' साझा की थी अब उनकी एक और लघुकथा आपके सामने है। आपकी टिप्पणियाँ हमारे लिए बहुत उपयोगी है सो उनमें कंजूसी न बरतें। लघुकथा समवाय एक खुला मंच है। यह सबके लिए खुला है। कृपया हमें अपनी लघुकथा मेल करें। मेल आई डी है -
    tarunguptadu@gmail.com
    shodharthidu@gmail.com
    Mob - 09013458181


    दिनेशा शुरू से ही बदमाश था। लेकिन वह कभी भी अपने अम्बेडकर नगर के लोगों से नहीं लड़ता-झगड़ता था। बड़ों को सम्मान देता और छोटों को प्यार।
    एक दिन कहीं से आ रहा था कि रास्ते में शक्तिपुरा के ठाकुर साहब ने उसे देखकर अपनी मूंछों पर तांव देना शुरू कर दिया था मानो कह रहे हो, कितने ही बड़े गुण्डे बन जाओ मेरा कुछ भी नहीं उखाड़ सकते।
    ठाकुर साहब को मूछों पर ताव देता देख दिनेशा बौखला गया था। बस दबोच लिया था ठाकुर साहब को उसने और उस्तरा से उनकी एक मूंछ काट ली थी। वह चाकू अपने साथ नहीं रखता था उस्तरा ही रखता था। उसका तर्क था चाकू से ज्यादा उस्तरा कारगर होता है। खैर जैसे ही ठाकुर साहब की मूंछ वाली बात शक्तिपुरा में पता लगी। आ गए ठाकुर अम्बेडकर नगर पर चढ़कर । दोनों तरफ से चलती गोलियां की आवाज से पूरा क्षेत्र थरथराने लगा था। बाद में पुलिस-थाना हुआ।
    अम्बेडकर नगर के सभी लोग अपने क्षेत्र से सुरक्षित सीट से जीते विधायक जी के पास पहुंच गए थे। सारी बात बतायी थी। विधायक जी गुर्राए थे, ‘‘दिनेशा और दिनेशा का साथ देने वाले आप सभी लोग दोषी हो। उल्टे काम करते हो फिर मेरे पास आते हो...............।’’
    अभी, विधायक जी बोल भी नहीं पाए थे कि दिनेशा धीरे से बोला था, ‘‘चचा, ये लोग तो हमेशा से ही उल्टे काम करते आए है उसका क्या................।
    ‘‘वे बड़े लोग हैं।’’ विधायक जी बोले थे।
    ‘‘नहीं...............अब परिभाषाएं बदल गई है।’’ राम रतन मास्टर जी ने दिनेशा की ओर लेते हुए कहा था और सभी अपने-अपने घरों को लौट आए थे। सभी ने दिनेशा का साथ दिया था। सुरक्षित सीट से जीते विधायक जी की बैठक, ठाकुरों और पुलिस के साथ चल रही थी।

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