पूरन सिंह ने हमें तकरीबन पाँच छः लघुकथाएँ मेल की थी इनमें एक को छोड़कर लगभग सभी दलित लघुकथाएँ थी। इससे पहले हमने आप के साथ उनकी लघुकथा 'भूत' साझा की थी अब उनकी एक और लघुकथा आपके सामने है। आपकी टिप्पणियाँ हमारे लिए बहुत उपयोगी है सो उनमें कंजूसी न बरतें। लघुकथा समवाय एक खुला मंच है। यह सबके लिए खुला है। कृपया हमें अपनी लघुकथा मेल करें। मेल आई डी है -
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दिनेशा शुरू से ही बदमाश था। लेकिन वह कभी भी अपने अम्बेडकर नगर के लोगों से नहीं लड़ता-झगड़ता था। बड़ों को सम्मान देता और छोटों को प्यार।
एक दिन कहीं से आ रहा था कि रास्ते में शक्तिपुरा के ठाकुर साहब ने उसे देखकर अपनी मूंछों पर तांव देना शुरू कर दिया था मानो कह रहे हो, कितने ही बड़े गुण्डे बन जाओ मेरा कुछ भी नहीं उखाड़ सकते।
ठाकुर साहब को मूछों पर ताव देता देख दिनेशा बौखला गया था। बस दबोच लिया था ठाकुर साहब को उसने और उस्तरा से उनकी एक मूंछ काट ली थी। वह चाकू अपने साथ नहीं रखता था उस्तरा ही रखता था। उसका तर्क था चाकू से ज्यादा उस्तरा कारगर होता है। खैर जैसे ही ठाकुर साहब की मूंछ वाली बात शक्तिपुरा में पता लगी। आ गए ठाकुर अम्बेडकर नगर पर चढ़कर । दोनों तरफ से चलती गोलियां की आवाज से पूरा क्षेत्र थरथराने लगा था। बाद में पुलिस-थाना हुआ।
अम्बेडकर नगर के सभी लोग अपने क्षेत्र से सुरक्षित सीट से जीते विधायक जी के पास पहुंच गए थे। सारी बात बतायी थी। विधायक जी गुर्राए थे, ‘‘दिनेशा और दिनेशा का साथ देने वाले आप सभी लोग दोषी हो। उल्टे काम करते हो फिर मेरे पास आते हो...............।’’
अभी, विधायक जी बोल भी नहीं पाए थे कि दिनेशा धीरे से बोला था, ‘‘चचा, ये लोग तो हमेशा से ही उल्टे काम करते आए है उसका क्या................।
‘‘वे बड़े लोग हैं।’’ विधायक जी बोले थे।
‘‘नहीं...............अब परिभाषाएं बदल गई है।’’ राम रतन मास्टर जी ने दिनेशा की ओर लेते हुए कहा था और सभी अपने-अपने घरों को लौट आए थे। सभी ने दिनेशा का साथ दिया था। सुरक्षित सीट से जीते विधायक जी की बैठक, ठाकुरों और पुलिस के साथ चल रही थी।
लघुकथा समवाय यह समूह बनाने की जरुरत शायद इसलिए भी है कि आज जैसे कहानियों के इस दौर में लघुकथाओं पर एक संकट सा आ गया जान पड़ता है।मेरी कोशिश है कि हर वो शख्स जो अपने अनुभव को कथा खासकर लघुकथा में रूपांतरित करने का हुनर जानता हैं। वह यहाँ इस ब्लॉग पर उस अनुभव को चस्पा करें। हमें अपनी लघु कथा भेजे। हमसे संपर्क करे। लेकिन इस योजना के लिए ज़रूरी है कि आप अपनी मौलिक लघुकथाएँ हमें भेजें। हमारा ईमेल आईडी है tarunguptadu@gmail.com dr.tarundu@gmail.com Mob :- 09013458181
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शनिवार, 14 जुलाई 2012
सोमवार, 2 जुलाई 2012
भूत - पूरन सिंह
एक दिन दोपहर को मैंने मां से कहा, ‘‘बहुत भूख लगी है।’’
मां कुछ नहीं बोली उसने मिट्टी के बरतन
उलट कर दिखा दिए थे।
मेरी भूख और तेज हो गई थी। भूख के तेज
होते ही मस्तिष्क भी तेज हो गया था। पास ही श्मशान घाट था जहां बड़े .बडे लोग अपने
बच्चों को भूत-प्रेत से बचाने के लिए नारियल, सूखा गोला पूरी-खीर कई बार मिष्ठान भी रख आते थे। यह सब काम
दोपहर में होता था या फिर आधी रात को।
मैं श्मशान घाट चल दिया था। संयोग से वहां
खीर पूरी और सूखा गोला रखा था। गोले पर सिंदूर और रोली लगी थी। मैंने इधर-उधर
देखा। कोई नहीं था। मैंने जल्दी-जल्दी आधी खीर पूरी खा ली थी और गोला झाड़ पोंछकर अपनी
जेब में रख लिया। आधी खीर पूरी लेकर मैं घर आया था। मेरा चेहरा चमक रहा था।
चमकते चेहरे को देखकर मां ने पूछा,
‘भूख से भी चेहरा चमकता है क्या। तू इतना खुश
क्यों हैं?
मैंने बची हुई आधी खीर-पूरी माँ के आगे कर दी
थी। माँ सब कुछ समझ गई थी। माँ की आंखें
छलक गई थी और उसने मुझे अपने आँचल में छिपा लिया था मानो भूत से बचा रही हो कि
उसके होंठ फड़फड़ाने लगे थे, ‘भूत, भूख से बड़ा थोड़े ही होता है।’
मैं कुछ नहीं समझा था। मैं मां के आंचल
में और छिपता चला गया था।
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