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सोमवार, 10 दिसंबर 2012

थोडा सा सुकून


दौड़ते- भागते न जाने कितनी कहानियाँ हमसे टकराती हैं। कुछ हमें हवा की तरह हलके से छूकर निकल जाती हैं तो कुछ हमारी आँखों के फ्रेम में तस्वीर की तरह जम जातीं हैं और कुछ हमारे बगल में हमारे साथ कुछ ऐसे चिपक कर बैठ जाती हैं जैसे वो न जाने कबसे हमें ढूंढ रहीं थीं और आज जबकि हम उन्हें मिले हैं तो उन्हें कुछ वक्त के लिए ही सही पर थोडा सा सुकून तो मिला है।
सुकून!! बड़ा ही अजीब किस्म का शब्द है। पता नहीं कितने ही रंग की मिट्टियों में दबा रहता है ये शब्द। ज़रा सी हवा चली नहीं कि कागज़ के पुर्जे की तरह कहीं भी पहुँच जाता है। बिना किसी की इजाज़त के किसी की गोद में छुप जाता है तो किसी की उँगलियों के पोरों में गम हो जाता है। किसी की मुस्कराहट में, किसी की आँखों में तो किसी के कंधे पर ही चिपक जाता है और कभी कभी किसी के अन्दर हवा की तरह ऐसे घुल जाता है कि क्या कहें।
उस दिन मेट्रो में सफ़र करते वक्त ये सुकून नाम का पुर्जा मेरे अन्दर न जाने कब घुल गया था मुझे इसका अंदाज़ा तब हुआ जब मेरा खाली दिमाग मेट्रो की तुलना एक अलग ही संस्कृति को समेटे पैसेंजर ट्रेन से कर रहा था जिसमे कितने ही छोटी छोटी दुकानदारियाँ समेंटे कभी कोई चने वाला चढ़ता है तो कभी दालमोठ वाला, कभी अदरक, मिर्ची या मूली लिए कोई बूढी अम्मा नज़र आती हैं तो कभी खिलोने या ऐसी ही कोई चीज़ बेचने आये कोई बूढ़े अंकल। मैं सोच रही थी कि मैं मेट्रो की जगह पैसेंजर ट्रेन में सफ़र कर रही होती तो मेरा दिमाग घर की रसोई की तरफ नहीं दौड़ रहा होता ट्रेन में ही मेरे खाली पेट का चटपटा निवारण हो गया होता। मेरा दिमाग इन्हीं ख्यालों में था कि अचानक एक आवाज़ ने मेरा ध्यान खींचा। मेरे बगल में अधेड़ उम्र की एक महिला खडी थीं। जो कुछ तेज़ आवाज़ में अपनी बगल वाली महिला से कह रहीं थीं कि मेट्रो में भी बैठने के लिए जगह नहीं मिलती है। चाहे कितना ही क्यों न थके हो खड़े होकर ही जाना पड़ता है। मुझे उनकी बातें अन्दर तक भेद रहीं थीं क्योंकि मुझे लग रहा था की कायदे से मुझे उनके लिए सीट खाली कर देनी चाहिए पर 55 मिनट के लगातार तीन लेक्चेर्स के बाद मेरे अन्दर केवल इतना ही दम रह गया था कि में या तो मम्मी का लंच ले जाने का आग्रह ठुकराए जाने पर पछताऊँ या फिर मेट्रो की तुलना पैसेंजर ट्रेन से करके खयाली पुलाव पकाऊ। मन तो कह रहा था कि उठ जाना चाहिए पर शरीर मना कर रहा था। पर शायद भगवान ने मेरी सुन ली थी क्योंकि मन और शरीर की इसी कशमकश को विराम देते हुए अचानक मेरे बगल वाली सीट खाली हो गई और वो महिला मेरे बगल में आकर बैठ गईं . आह !! मैंने सुकून की सांस ली। अपने अन्दर घुले सुकून का मुझे हल्का सा एहसास हुआ। तभी मुझे लगा कि उन्हें कुछ दिक्कत हो रही है इसलिए मैंने उनसे पूछा कि- आप ठीक से तो हैं न, कोई दिक्कत तो नहीं?
मेरी बात सुनकर जैसे उनके चेहरे पर चमक आ गई और वो बोलीं- हाँ बेटा मैं ठीक हूँ। बहुत दूर से आ रही थी बहुत थक गई थी। पर क्या करूँ थकान ही जिंदगी है। उनकी बात सुनकर मैंने एक संवेदनापूर्ण मुस्कराहट के साथ सहमति व्यक्त की। दरअसल मुझे समझ ही नहीं आया था कि उनकी इस बात पर क्या कहूं। पर शायद उन्हें पता था कि उन्हें मुझसे क्या कहना है। बातों ही बातों में उन्होंने मुझे अपनी पूरी कहानी सुना दी कि कैसे 47 वर्ष की जिंदगी में उन्होंने जीवन में कितने दुःख उठाये। जब लगा कि बेटे से सुख मिलेगा तो वो भी अपनी पत्नी के साथ दूसरे शहर चला गया और रह गईं वो और उनके पति जो आपस में जैसे-तैसे कर के अपने सुख-दुःख बाँट लेते है। इतने में उनका ध्यान बगल में आकर खड़ी हुई एक लड़की पर गया जिसने अनारकली ढंग का सूट पहना हुआ था। उसे देखकर वो बोलीं- आजकल ऐसे सूट बहुत चल रहे हैं। तुम बच्चों पर ही अच्छे लगते हैं, जिसपर मैंने कहा कि आप पर भी ऐसा सूट बहुत अच्छा लगेगा। मेरी बात सुनकर वो फिर गंभीर हो गईं और बोलीं- भगवान् तुझे हमेशा सुखी रखे बेटा पर न तो अब शौक करने की मेरी उमर है और न ही तेरे अंकल के पास इतना पैसा। जैसे-तैसे कर के हम जिंदगी गुज़ार रहे हैं। सुख की चाह में 47 बरस बिता दिए पर केवल दुःख मिला, कहते-कहते वो सुबक पड़ीं। तब मैंने उनका हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा कि आंटी अब तक आपकी जिंदगी में जो हुआ, या जो दुःख आये उसे तो नहीं बदला जा सकता पर इतना विश्वास मानिए कि अब आपकी जिंदगी में इतनी खुशियाँ आएँगी कि आप पिछला सब कुछ भूल जाएँगी। मेरी बात सुनकर वो उत्सुकता से बोलीं तू सच कह रही है बेटा?
मेने कहा- हाँ में बिलकुल सच कह रही हूँ। मैं कोई ज्योतिषी या भविष्य वक्ता तो नहीं पर पता नहीं मैंने कैसे इतने विश्वास के साथ उनसे यह कह दिया था। मन ही मन भगवन से प्रार्थना भी की थी कि प्लीज़ मेरी बात मान लेना। इसके बाद मैंने उठते हुए कहा कि मेरा स्टॉप आ गया है मुझे जाना होगा। पर मेरी बात आप ज़रूर याद रखना।
वो जैसे ये मान कर बैठी थीं कि मैं उनके साथ कुछ और दूर तक जाऊंगी, मेरी बात सुनकर हैरानी से बोली- बस तू यहाँ तक ही है मेरे साथ।
उनकी बात का जवाब देने का समय नहीं था मेरे पास वरना शायद मैं उनसे कहती कि यहाँ तो जिंदगी का नहीं पता कि कौन कितना साथ निभाएगा फिर ये तो मेट्रो है जहाँ कहानियां अपने सजीव पात्रो के साथ अजनबियों में सुकून तलाशती हैं जैसे एक कहानी ने मुझमे अपना थोडा सा सुकून तलाशा।

बुधवार, 29 अगस्त 2012

एक दृश्य जिंदगी


बगल में रखे सुन्न से मोबाइल फोन पर उसने एक सरसरी सी निगाह डाली और अपनी आँखें भींचकर चेहरा दूसरी तरफ ऐसे घुमा लिया जैसे घर के अंदर घुसने को आतुर अपने किसी बेहद अन्तरंग के मुंह पर अनायास ही दरवाज़ा पटककर सहज होने की बेहद नाकाम सी कोशिश की जाए. इसी कोशिश के तहत उसने अपनी निगाह खिड़की से बाहर बिल्डिंगों से तराशे गए आकाश पर टिका दी जहाँ कितने ही बेचैन परिंदे इधर से उधर न जाने किस फ़िक्र में भटक रहे थे. उसकी निगाहें देर तक उन परिंदों की फ़िक्र के साथ कुछ तलाशने का बहाना करती रहीं और फिर न चाहते हुए भी वापस मुर्दा हो चुके मोबाइल पर आकर टिक गईं.नज़र टिक जाती है मगर ख़याल नहीं टिकते. अदृश्य परिंदों की तरह जिंदगी से तराशे गए दिमागी आसमान में न जाने किस फ़िक्र में चक्कर लगाते रहते हैं, इधर से उधर और हासिल कुछ भी नहीं. वही बदहवासी, वही फिक्रमंदी और वही बेवजह की उड़ान इधर से उधर. शायद यही जिंदगी है. मोबाइल पर टिकी निगाह ने जैसे एक पूरी उम्र का फलसफा पेश कर दिया था उसके सामने. एक पूरी उम्र जो उसने इन दो वर्षों में बिताई थी एक चित्रपट के समान आँखों के सामने से गुज़र गई.
पहली बार जब वो कुसुम से मिला था. कितना अजीब सा था वो मिलना. पूरी तरह से उन्रोमंटिक. पर आज वही सब कुछ कितना ख़ास और कितना अलग लगता है.लगता तो ऐसा भी है कि काश जिंदगी को rewind किया जा सकता तो वो अपनी टिकी हुई निगाह की तरह थाम लेता वक्त के उस टुकड़े को और जिंदगी वहीं ठहर जाती न कोई बदहवास और फिक्रमंद उड़ान होती न ही कुछ और तलाशने और पाने की इच्छा..
उसे याद आता है मस्तिष्क पर खिंचता उसकी खूबसूरत सी उस नई जिंदगी के चित्रपट का वो पहला दृश्य जिसका दिन और तारीख तो उसे याद नहीं पर इतना ज़रूर याद है कि ऑफिस में 'उसका' वो पहला दिन था. खूबसूरत हरे रंग की साड़ी में कितनी खिल रही थी वो ये उसने नहीं देखा था क्यूंकि वो एक निर्लिप्त और वीतरागी व्यक्ति के समान अखबार पढ़ रहा था. उसका ध्यान कुसुम की तरफ तब गया था जब वो अचानक उसके बगल में आकर बैठी और उसकी साड़ी के पल्लू का किनारा उसके हाथ पर आ गिरा. उसे याद है कि किस तरह उसने गुस्से में एक झटके से उसके पल्लू को वापस उसकी और उछाल दिया था और तब कुसुम ने कहा था ओह आई एम सो सॉरी. उसने तभी उसकी और नज़र घुमाकर देखा था. उस वक्त उसकी सहमी हुई सी आँखें देखकर उसे पहली बार एहसास हुआ कि जैसे उसका निर्लिप्त और वीतरागी ह्रदय किसी अदृश्य राग में रम गया है. बस यहीं से हो गई थी शायद एक नई जिंदगी की शुरुआत.
नई जिंदगी... कितने कमाल की बात है कि एक उम्र की इस जिंदगी में टुकड़ों-टुकड़ों में बँटी न जाने कितनी जिंदगियां बसती हैं. छोटी-बड़ी जिंदगी, रंगीन तो कभी बदरंगी जिंदगी, धूप सी उजली रौशन जिंदगी तो कभी स्याह काली जिंदगी. और भी न जाने कितनी अनगिनत जिंदगियां. रोज़ जीती और दम तोडती जिंदगियां. इन्हीं ज़िन्दगियों में इन्सान गुज़रता रहता है. एक जिंदगी से दूसरी जिंदगी में गोता लगाता रहता है और इसी बीच अपने दिल से अपने हाथ में थामी हुई उसकी अपनी जिंदगी कब उसके हाथ से फिसल जाती है उसे खुद पता नहीं चलता...
दृश्य ख़त्म हुआ नहीं कि विचारों की एक बेवजह की उठापटक शुरू. शरद इसी झुंझलाहट में जोर से अपना हाथ मेज पर पटक देता है, पर इससे क्या होता है. सवाल तो सवाल हैं उठेंगे ही. बे सर-पैर के सवाल जिनका जवाब पाने की न तो खुद उसकी तरफ से कोई कोशिश है और न ही कोई इच्छा. पर जवाब मिले न मिले सवाल तो उठेंगे ही, उठ ही रहे हैं. कोई बेगाना पूंछे तो और बात है पर यहाँ तो अपना दिमाग पीछा नहीं छोड़ता. फ़िज़ूल के सवालों की रस्साकशी आखिर पटक ही देती हैं उसे उस भंवर में जहाँ वो सोचने लग जाता है कि आखिर कुसुम में ऐसा क्या था जिसने उसकी जिंदगी को अचानक ही एक नई जिंदगी से नवाज़ दिया था. शायद उसकी सादगी, उसका भोलापन, उसके चेहरे पर खिली हुई मुस्कराहट या फिर खुद उसके अपने मन के खालीपन को भरने की एक अनवरत तलाश जो एक अनजानी सी चाह में कुसुम के आस-पास सिमट आई थी. या कुछ और... पता नहीं. एक बार फिर वह सवालों के पुलिंदे को उठा कर जैसे खिड़की से बाहर फेंक देता है इस एक जवाब के साथ कि कुसुम में कुछ ऐसा था जिसने एक उम्र से सोये पड़े उसके बचपन को मासूम सी अंगडाई के साथ जगा दिया था.
और इसके साथ ही फिर एक दृश्य शुरू जिसमे उसकी आँख एक नई सुबह में खुलती है. जिंदगी वाकई कितनी बदल सी गई थी इस दृश्य में. रोज़ ही की तरह सूरज का निकलना, पक्षियों का चहचहाना. ऑफिस निकलने की भाग दौड़, वही खाना, वही पीना वही सोना. सब कुछ वही पहले जैसा ही तो था लेकिन उस सब में एक नए किस्म का बदलाव आ गया था. जिसके बारे में वो खुद बहुत हैरान था.
दृश्य आगे बढ़ता है जहाँ वो खुद को कुसुम के ख्यालों में कहीं गुम पाता है..... शायद कुसुम भी ऐसा ही कुछ महसूस करती रही होगी. शायद जैसा बदलाव उसकी जिंदगी में आया है वैसा ही बदलाव उसकी जिंदगी में भी आया हो और शायद वह भी उसके बारे में ऐसा ही कुछ सोचती होगी जैसा कि वह. और इसी उधेड़बुन में अनगिनत सुबह, शाम और रातों का गुज़र जाना और इसके साथ ही वक्त का सूखे पत्ते की तरह झुर्र हो जाना. और इसके साथ ही जिंदगी का अचानक सिकुड़ सा जाना....
इसी दृश्य में उसे याद आता है कि बिल्कुल पहली मीटिंग की तरह पूरी तरह से फ़िज़ूल और अनरोमेंटिक अंदाज़ में उन दोनों का रोज़ ऑफिस में मिलना. उसकी रोज़ हैलो से आगे बढ़कर कुछ कहने की नाकाम कोशिश करना और आखिर एक बेतुकी सी मुस्कान के साथ संवाद की प्रक्रिया का शुरू होने से पहले ही ख़त्म हो जाना. खूबसूरत जिंदगी के अनगिनत टुकड़ों को समेटे आखिर ये दृश्य एक उजाले के साथ ढल जाता है. एक ऐसा उजाला जिसने बंद कमरे में चुपचाप बैठे शरद की आँखों में एक नई चमक भर दी. गुनगुनी धूप से भरा यह दृश्य जैसे एक पूरी जिंदगी नहीं बल्कि न जाने कितनी जिंदगियों की चमक को अपने समेटे हुए था. और फिर इसी उजले दृश्य के साथ स्मृतियों के अदृश्य चित्रपटल पर एक और दृश्य उभर आता है. उसे याद आता है वो वाक्य जो उसने शर्माजी की रिटायरमेंट पार्टी के वक्त चुपके से कुसुम से कहा था और जिसने उसकी जिंदगी को एक और खूबसूरत सी जिंदगी से नवाज़ दिया था. उसे याद आता है कि कैसे उसने बहुत हिम्मत जुटाकर कांपती सी आवाज़ में कुसुम से कहा था कि "मैं अपनी पूरी जिंदगी तुम्हारे साथ गुजारना चाहता हूँ इसमें तुम्हें कोई ऐतराज़ तो नहीं". उसे यह भी याद आता है कि किस तरह उसका दिल बहुत ज़ोरों से धड़क रहा था और उसे लग रहा था कि कुसुम के साथ उसका वह मुस्कराहट का रिश्ता, जिसने उसकी कोमा में पड़ी हुई जिंदगी को अचानक जिंदगी से नवाज़ दिया था, वो उसके इस कदम से शायद अब ख़त्म हो जाएगा. कुसुम शायद उससे अब हैलो भी नहीं करेगी. और हैलो तो क्या उसकी तरफ देखेगी भी नहीं और अगर ऐसा हुआ तो.. तो..वो जियेगा कैसे....उसकी जिंदगी फिर किसी अँधेरी खोह में गुल हो जायेगी......नहीईई..पर ऐसा हुआ नहीं. ऐसा कुछ भी नहीं हुआ जिसका उसे डर था. उसे याद आता है कि कैसे उसकी बात सुनकर कुसुम ने आश्चर्य से उसकी ऑर देखा था ऑर मुस्कुराकर कहा था नहीं. मुझे कोई ऐतराज़ नहीं.
स्मृतियाँ क्या कमाल की चीज़ होती हैं. अतीत को ऐसे सजीव बना देती हैं जैसे आज, अभी, बिल्कुल हाल की ही बात हो शरद की अदृश्य पटल पर टिकी दृष्टि से टपकी हुई एक बूँद मुस्कान इसका प्रमाण थी जो उसके चेहरे पर अचानक से चमक उठी थी.
आह उस वक्त उसे ऐसा लगा था जैसे एक ही छलांग में वो आकाश के सारे सितारे तोड लेगा. कितना ख़ास था वह दिन. उसके चहरे की ख़ुशी छिपाए नहीं छिप रही थी. उसकी और कुसुम की चुपचाप सी, खूबसूरत सी जिंदगी में संवादों का एक नया अध्याय जो जुड़ गया था. जिंदगी की फिर से एक नई शुरुआत हो गई थी. जिंदगी में से निकलती एक सतरंगी. एक इन्द्रधनुषी किर्णीली जिंदगी जिसके हर स्पर्श में हर रंग में वह खो जाना चाहता था.
चित्रपट की रील एक बार फिर घिर्र से घूम जाती है और इस बार एक साथ कई सारे दृश्य दृष्टि के फ्रेम में फिट हो जाते हैं. सुबह से शाम शाम से रात रात से अगली सुबह तक के ऐसे अनगिनत दृश्य और यूँ ही लगातार...
वो छोटा सा दृश्य जिसमें मोबाइल के की-पैड पर थिरकती उसकी उँगलियाँ कुसुम और उसके मन के राग का अनुगमन कर रही थीं, अचानक सबसे बड़ा हो जाता है सारे दृश्य उस छोटे से दृश्य के पीछे छिप जाते हैं, धुंधले पड़ जाते हैं. और वह देखता है कि किस प्रकार उसके और कुसुम के होठों पर एक मुस्कराहट खिली है. कैसे दोनों ऐसी बातों पर भी हँस रहे हैं जिनके पीछे हंसी की कोई वजह ही नहीं. कैसे दोनों एक दूसरे का हाथ थामे घंटों पार्क में टहल रहे हैं. और इसी क्रम में वक्त बहा जा रहा है बहुत तेज़ी से. इतनी तेज़ी से कि वक्त की एक बूँद भी नहीं बाकी नहीं रह गई और दृश्य ख़त्म. बिना किसी पूर्व सूचना के दृश्य ख़त्म.
इस दृश्य की समाप्ति उसे जितना साल रही थी उतना ही शायद उस नए दृश्य की अनचाही उपस्थिति भी जिसमें वो सिसकता हुआ कैंसर हॉस्पिटल में खुद को कुसुम के सिरहाने बैठा हुआ पाता है. उसके आंसू पानी की तरह बह रहे हैं. वह बच्चों की तरह बिलख रहा है और कुसुम अपने सिरिंज लगे हाथ से उसके आंसू पोंछ रही है.. और....और बहुत दूर तक घिसटता ये शब्दहीन दृश्य उस दृश्य में गुल हो जाता है जहाँ सुलगती एक तेज़ आग में उसका अपना मन भी राख हो गया था और उसके साथ ही उसकी एक दृश्य जिंदगी भी.

बुधवार, 11 जुलाई 2012

मियां कक्कन - विभा नायक

  • मियां कक्कन के बारे में बहुत सुना था. कस्बे के लोग बताते हैं कि किसी ज़माने में सूरज पश्चिम से निकलता था पर मियां कक्कन को ये गवारा न था कि सूरज पश्चिम से निकले आखिर उनकी माशुका का घर भी तो पश्चिम में ही पड़ता है. खुदा न खुआस्ता कभी सूरज और उनकी माशुका के नैन लड़ गए तो उनका क्या होगा. बैठे-बिठाये चप्पलें तोड़कर कमाई बदनामी बेकार न हो जायेगी. तो बस सूरज का रास्ता बदलवा दिया. कहने-सुनने वालों की तो बोलती ही बंद हो गई. मुंह खुला का खुला रह गया. ऊपर के दांत ऊपर और नीचे के दांत नीचे. सब इशारों-इशारों में एक दूसरे से पूछते कि लाहौल विला कुव्वत !! ये हुआ तो हुआ कैसे? न चूँ न चाएँ न ताली न धायँ ये गज़ब कैसे हो गया. पूरे क़स्बे में चुप्प सा हल्ला गुल्ला हो गया पर मियां कक्कन??.... मियां कक्कन ठहरे मियां कक्कन उन्हें कोई फरक नहीं पड़ा. फुसफुसाती कितनी ही हवाएं उनके कान के बगल से निकल जातीं पर मियां कक्कन उन हवाओं की बदगुमानी को नज़रंदाज़ करते हुए सुड़कदार अंदाज़ में चाय पीते और मूछों ही मूंछों में मुस्कराते. खुदा जाने कि उनकी इस बेपरवाही की राजदार ऐसी कौन सी बात थी जो उनकी मूंछों से निकलकर चाय की सुडकियों में तो गुल हो जाती पर बगल से गुजरने वाली हवा को भी उसका गुमां नहीं हो पाता.
    लोग कहते हैं कि अपनी ही दुनिया में मशगूल आज के मियां कक्कन जो इस छोटे से कसबे में झोपड़ी बनाकर रहते हैं, एक ज़माने में उनकी बात ही अलग थी. मथुरा के पास के ही किसी इलाके के खानदानी ज़मीदार थे हमारे मियां और ज़मींदार क्या पूरी नवाबी शान थी उनकी. बाप-दादों की बड़ी जायदाद के अकेले वारिस. ज़मीन-जायदाद, नौकर-चाकर, ऐशो-आराम और खानदानी इज्ज़त का नशीला रुतबा जो अब मियां की बस सतखिर्री मूंछों में ही चमकता है. न जाने कहाँ हवा हुआ. कहने वाले तो यहाँ तक कहते हैं कि मियां अपने ज़माने के बड़े दिलफेंक किस्म के आशिक थे. जहाँ भी नाज़नीन नज़रे-नगीच हुई नहीं कि मियां का दिल रुखसत और साथ ही दौलत भी. ऐशो-आराम भी. ज़मींदारी भी. शाम के वक्त चिलम का लम्बा कश भरते कुछ बुजुर्गों को यह भी कहते सुना है कि काके शाह मालिक उर्फ़ हमारे मियां कक्कन ज़मीदार तो थे पर जेहनी तौर पर एक बेहद भले और मासूम किस्म के इंसान भी थे. किसी दर्दमंद या ज़ईफ़ को देखा नहीं कि बस दौड़ पड़े उसकी मदद को. इनकी चौखट से कोई खाली हाथ नहीं जाता था. ब्याह भी हुआ था, बाल-बच्चे और सलीकेदार बेग़म क्या कुछ नहीं था इनकी गृहस्थी में पर नसीब का खेल कौन जानता है. मियां कक्कन एक खूबसूरत हूर की गिरफ्त में आ गए. अब हूरें इंसानों की तरह पांच तत्वों की पैदाइश तो होती नहीं हैं कि उनमें जज़्बात हों, बस क्या था अपने हुस्न का दीवाना बनाकर राख कर गई मियां कक्कन की जन्नत.
    क़स्बे की मिट्टी में रेत के जितने कण होंगे शायद उतनी ही अलग-अलग तरह की कहानियां मियां कक्कन को लेकर प्रचलित थीं. पर एक बात पर सबका यकीन था और वो ये कि साठे की उम्र पार करके भी मियां कक्कन बड़े पाठे हैं. दिल भी पूरी जवानी के साथ धड़कता है. तभी तो इस उम्र में भी इनकी एक खूबसूरत माशूका है. अब माशुका कौन है, कहाँ है, ये किसी को नहीं पता पर है ज़रूर और बेहद खूबसूरत है यह सबको पता है. भोला हलवाई जिसकी बनाई चाय को कुरान की आयत की तरह मियां अपने ज़ेहन में उतारते हैं, ने एक बार बताया था कि मियां की जेब में एक बार एक चूड़ी देखी गई थी. जेब से झांकती गोल गोल चूड़ी हो न हो इनकी माशूका की ही थी. भोला हलवाई की ही तरह दीनू महंत ने भी कक्कन मियां के कुरते की जेब से रंगीन रूमालों के झाँकने की बात कई बार बड़े गर्व से कुबुली थी. कसबे के आवारा लड़के भी बड़े चटकारे लेकर मियां कक्कन की मोहब्बत की ऐसी कई दास्ताने सुनातें हैं और कद्रदानों से वाहवाहियां बटोरते हैं पर एक बात जो हैरान करती है वो ये कि किसी की भी ज़ुबान या निगाहों में इतनी हिम्मत नहीं होती थी कि वो मियां के सामने अपनी करामात दिखा सकें हालाँकि मियां कक्कन को इन दस्तानों से कोई फर्क नहीं पड़ता वो तो बस एक पक्के मुसलमान की तरह दिन में तीन बार भोला हलवाई की दुकान की चाय से गला तर्र करते हैं, दमड़ी थमाते हैं और निकल पड़ते हैं कसबे के पहाड़ी इलाके की तरफ किसी अज्ञात स्थान की ओर.
    ख़ैर कसबे के लोग भी आखिर कब तक अपने सवालों के जवाबों का इंतज़ार करते.इसलिए पहुँच गए मियां का पीछा करते-करते उसी अज्ञात स्थान पर जहाँ हमारे मियां कक्कन सर्दी-गर्मी, बरसात, आंधी, तूफ़ान की फ़िक्र किये बगैर जाया करते थे. पर ये क्या? खोदा पहाड़ निकली चुहिया भी नहीं! सोचा था कि........
    यहाँ तो खेल ही उल्टा पड़ गया क्या देखते हैं कि मियां कक्कन एक बहुत बड़ी हवेली के सामने के मैदान में करीब दर्ज़न भर बच्चों के साथ बच्चे बने हैं. उनके साथ दौड़ रहे हैं. उछल कूद रहे हैं. छोटी सी एक बच्ची तोतली ज़बान में कह रही है काका आप जो चूली लाये ते न तूलज बैय्या ने तोल दी. काका आप बैय्या ती पिट्टी पिट्टी लदाओ. और हमारे कक्कन मियां तुतला कर कह रहे थे, मुनिया तेले लिए ऑल चूली लाऊंगा. काका आज यहीं रुक जाओ न. ११-१२ साल की बच्ची ने काका का हाथ पकड़ते हुए कहा. इतने में बाकी बच्चे भी शोर मचाते हुए कहने लगे के काका रुक जाओ, काका रुक जाओ. पास कुछ लोग हाथ बांधे खड़े थे जिनमें से एक मियां के नज़दीक आकर बोला. साब आज बच्चों के साथ हवेली में ही रुक जाइए बच्चों की बड़ी इच्छा है. आप रुकेंगे तो आपकी ये हवेली भी धन्य हो जायेगी. पर मियां कक्कन सिर हिलाते हुए बोले- न सुखना न. अब हवेली बच्चों की है. अपनी तो बस वही झोपड़ी भली. अपनी माँ को सुखना वचन दिया था मैंने कि तेरी हवेली को खुशियों से भर दूंगा.तुझे पता है न सुखना कि मेरी माँ ने यशोदा बनकर मुझ जैसे बिन माँ-बाप की औलाद को अपनाया. जब माँ ने मुझे ये बताया तो दिल तो मेरा बहुत टूटा पर उस दिन मुझे घर का मतलब समझ आ गया. मैंने भी सोच लिया था कि अपनी शादी करके घर तो सभी बसाते हैं पर मैं अपने जैसे हर उस बच्चे को घर दूंगा जिसका अपना कोई नहीं है. . .....कहते-कहते कक्कन मियां अचानक रुक गए और बोले...क्या सुखना वही पुरानी बातें.. चल अब खेलने दे मुझे. अपने बच्चों के साथ.. कहते हुए कक्कन मियां ने अपने कुरते से अपनी पलके पोंछी और बच्चों के साथ फिर से मस्त हो गए.
    सुना है कि उसदिन दीनू महंत और भोला हलवाई जो कस्बे की ओर से मियां कक्कन का पीछा करते करते हवेली तक पहुंचे थे. कक्कन मियां और बच्चों के साथ रात की ब्यारी करके ही लौटे. पर दोनों की आँखों में ढेर भरे आंसू ज़रूर जमा थे. लोगों ने बहुत पूछा पर मुहं से कोई बात ही नहीं फूटी. शायद कक्कन मियां ने उन्हें कोई कई कसम दे दी थी. ख़ैर खुदा जाने क्या था पर कमाल की बात ये हुई कि भोला हलवाई ने पता नहीं क्यों कक्कन मियां से दमड़ी लेना बंद कर दिया और कक्कन मियां को अब वह काका कहने लगा है. और पक्के ब्राह्मणवादी दीनू महंत कक्कन मियां के पाँव छूने लगे हैं.इतना ही नहीं कसबे के आवारा लड़के जब कक्कन मियां को लेकर चटकारेदार बयानबाजियां करते हैं तो ये दोनों उन्हें अपनी अपनी बारी आँखों से बरज देते हैं और कई बार तो डांटकर या गालियाँ देकर भगा भी देते हैं. उधर मियां कक्कन पहले की ही तरह अपने में मस्त हैं लेकिन क़स्बा?? क़स्बा वाकई हैरान है.......