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शनिवार, 13 अप्रैल 2013

स्मृति में प्रेम (रिंग सैरेमनी के बाद)


उस रात नींद कहीं उचट गई थी, ऐसा अक्सर होता था मेरे साथ। पर उस दिन कुछ ज्यादा ही देर तक जागा रहा। आँखें बंद कर देर तक बिस्तर पर पड़ा रहा, पर दिमाग जग रहा था। दिल में धड़कन नहीं कुछ और था जो बज रहा था। समझ नहीं आ रहा था कि ये क्या है मैं क्यों इतना बुझा-बुझा महसूस कर रहा हूँ। यह कल की रात थी। कल हमें उसने मिलने के लिए बुलाया था। वह आई हम देर तक मैक-डी में बैठे रहे। उसने आते ही पहले मिठाई का डिब्बा आगे कर दिया फिर अपनी उंगली, जिसमें उसकी सगाई की अंगूठी थी। मैंने पूछा डायमण्ड की है? उसके चेहरे की मुस्कराहट थोड़ी और बढ़ गई। मुझे लगा जैसे वो यही जताना चाहती है। कुछ देर बाद उसने अपना कैमरा निकाला और अपनी रिंग सैरेमनी की तस्वीरें दिखाने लगी, तब मुझे पहली बार महसूस हुआ कि उसने आज की मीटिंग के लिए बड़ी प्लानिंग की है।
तस्वीरों को देखते हुए मैं काफी देर तक चुप रहा शायद उस वक्त मैं बहुत बोलना चाहता था। वो अंदर से बहुत खुश थी पर ऊपर से ऐसा न दिखे इसी जुगत में लगी थी। हर बार की तरह मैं फिर से फ्लैश बैक में चला गया जहाँ उसका एक अदद जामनी रंग का घुटनों से नीचे तक का गर्म सूट (जिसे वो हफ्ते में चार दिन पहनती), टूटी सैंडल और चेहरे की मासूमियत कॉलेज के सामने के ग्राउंड में धूप सेंकने आया करते थे। कभी कभी सोचता हूँ क्या जिंदगी सिर्फ फ्लैश-बैक में जाने और वापस लौटने का नाम है?              

शनिवार, 8 दिसंबर 2012

अर्धांगिनी

बचपन में मास्टर जी ने कहा - मूर्ख। जानता है मूर्ख किसे कहते है। और संटी हाथों पर जड़कर चलते बने। ये फ्लैशबैक के दिन थे। फिर बचपन खत्म हुआ और हम कॉलेज में पहुँच एकाएक जवान हो गये। असल कहानी यहाँ शुरु हुई..

हमारे पास सिवाय मान जाने के कोई चारा नहीं था। हम सब दोस्त(एक के अलावा) आखिरकार मान गये। हमने अपने दिल को समझाया और अपनी राह को एक खूबसूरत मोड़ दे दिया। पर हम परेशां थे कि ये सारे मोड़ उसी मंज़िल की ओर फिर फिर क्यों बढ़ जाते हैं जिसे हम छोड़ना चाहते है। फिर हमने तय किया कि हम इन मोड़ों को भी अपनी राहों से हटा देंगे। हालांकि हम ऐसा कर नहीं सकते थे फिर भी हमने पूरी कोशिश की। हमने भरसक कोशिश की कि हम उसे भुला दें। पर वो हमारे जहन में एक बुरे सपने की तरह हावी थी। हम उन दिनों को कोसने लगे जब हमने उसे एक सुंदर, सुशील सभ्य मानने की गुस्ताखी की थी। हमारे आने वाले दस साल इस गुस्ताखी की सजा बने। ह
मने सजा पूरी ईमानदारी से भोगी। आज सन २०१२ में जब हमारा एक दोस्त डिप्टी सुपरिटेंडेंट है हमने जानना चाहा कि हमारी गलती क्या थी? उसने फिलॉसफी झाड़ते हुए कहा गलत युग में गलत न होना भी एक गलती है। अरे ये क्या बात हुई। हाँ टोटल ईमानदारी भी अपने आप में एक बेईमानी है। ये वही दोस्त है जो एक समय हम सबमें सबसे ज्यादा निकम्मा माना जाता था। जिसके बारे में हमें लगता था कि ये तो गया इसका क्या होगा। न पढ़ता है न पढ़ने देता है। हम किताबों में डूबे रहते ये शहर की खाक़ झानता, लोगो से बतियाना इसका प्रिय शगल था। २००५ के बाद से हमारी मुलाकात नहीं हुई थी हमने भी ध्यान नहीं दिया सोचा होगा साला कहीं। फिर पिछले साल मिला हमारी गुस्ताखी को अपनी अर्धांगिनी बनाये हुए। उस दिन हमें मूर्खता की परिभाषा मालूम हुई।

मंगलवार, 18 सितंबर 2012

प्रेम गली नहीं सांकरी - माया मृग


"तुमने कहा, "कहां गया वो पहले वाला प्‍यार...वो प्रेम...।"
पता नहीं.....उलाहना दे रही हो कि रखे की जगह पूछ रही हो....
....मुझे क्‍या पता तुम ही रख देती हो सब कुछ इधर उधर कहीं....। बीच रास्‍ते कहीं गिर ना गया हो...ठहरो, देख आता हूं...जिस रास्‍ते से आता है, उसी से लौट भी जाता है कई बार....कहीं कोई पैरों का निशान भर दिख जाए....बस...ढूंढ लूंगा...। अच्‍छा एक बार वो आला देख लेती....उस खिड़की के पास, जहां से तुम आते-जाते देखा करती थीं मुझे....हो सकता है मैंने ही कहीं देखा हो....मैं भी तो चीजें रखकर भूल जाता हूं आजकल....."
(माया मृग की वॉल से साभार)

पूरी संभावना है कि यह वक्तव्य माया मृग जी ने लघुकथा के रूप में न लिखें हों, लेकिन मुझे इमें एक लघुकथा दिखी सो यहाँ चेप दी। बाकि का हक़ आपका। - तरुण

सोमवार, 7 मई 2012

जो कभी हावी था दिलो-दिमाग पर...

दोपहर जिसमें सर्दियों के समापन का संकेत था। धूप पेड़ों से छनकर उस हरे लोहे के बैंच पर बैठी निशा के गालों और बालों को उम्रदराज़ बना रही थी। निशा के होंठो पर जमी पपड़ी कुछ कहना चाह रहीं थी। आंखें नीचे की ज़मीन में कुछ ढ़ंढ रही गिलहरी को घूर रहीं थी। चेहरा एक ही जगह जमा हुआ था लेकिन दिमाग में कुछ चल रहा था। मालियों की खुरपी माहौल को अशांत किये हुए थी। लंच होने ही वाला था शायद इसलिए वे अपना हाथ का काम समेट लेना चाहते थे। कौओ और गिलहरियों ने पेड़ों से उतरना शुरु कर दिया था। मिट्टी पर अभी पानी छिड़का गया था जिससे उठी खुशबू अब भी वसंत को क़ायम रखे थी।
निशा के बराबर में काफी देर से चुप बैठे विनोद ने पूछा - "क्या हुआ, कुछ तो कहो, चुप क्यों बैठी हो?" पलकें उठी, कोरों से पानी की कुछ बूँदें नीचे ही लुढ़कने ही वाली थी कि निशा ने चेहरे पर एकाएक मुस्कराहट लाते हुए कहा - "कुछ नहीं।" "... कुछ तो, प्लीज़ कुछ तो कहो? बताओ तो।" "... कुछ नहीं - कहा ना। क्या तुम भी मुझे चैन से जीने नहीं दोगे। मैं कुछ देर चुप रहना चाहती हूँ। इतने सालों की रिलेशनशिप में भी तुम ये नहीं समझ सके।" विनोद को जैसे ऐसे किसी जवाब की उम्मीद निशा से नहीं थी, वह अवाक् निशा के चेहरे को देखने लगा। उसने देखा उसके गाल होंठों की तरह सूखे हुए थे जैसे रात भर नमकीन द्रव्य में डूबे हों।..." प्लीज़ कुछ तो कहो..आज फैरेवल पार्टी है, कॉलेज का आखिरी दिन..कुछ तो बोलो..कुछ तो कहो.". उसने एक बार फिर कोशिश की।
निशा का शरीर जो अब तक अचेत था। एकदम हरकत में आया उसने अपने लाल पर्स से एक कार्ड निकाला और विनोद को थमाकर मालियों की मेहनत और लहराती घासों को कुचलती हुई चली गयी।
आज इतने सालों बाद भी निशा के पैरों के निशान उस जगह मौजूद है। उस बैंच पर उसका अहसास मौजूद है। उसके जेहन में हर साल सर्दियों की समाप्ति निशा के खयाल को पैदा कर देती है।

शहर में प्रेम

तेज़ हवा में अपने बालों को संभालतीं तुम दूर खड़ी थीं। मैं पास आ रहा था। पीले सूट पर सफेद चुन्नी क्या फ़ब रही है तुम पर। तारीफ़ करने पर भी तुम आग बबूला हो गयी थी। 'आज फिर लेट, तुम्हारी बात की कोई वैल्यू है या नहीं। जानते हो कितनी देर से यहाँ खड़ी हूँ, लोग ऐसे घूर रहे हैं जैसे अभी खा जाएंगे। मुझे ये सब बिल्कुल पसंद नहीं और तुम्हारा फोन , तुम्हारा फोन क्यों नहीं लग रहा।' एक साथ उसने इतने सवाल कर डाले। 
मैं उसकी आँखों में प्यार तलाश रहा था पर उनमें अजब बदहवासी और खौफ़ था।

शनिवार, 5 मई 2012

Valentine's Day

दूर वो दिखाई दी।.. उसने सोचा अब तो दे ही दूँ , पर फिर रुक गया। उसे आज ही उसके दोस्त ने कहा था कि ऐसे मामलो में जल्दबाजी ठीक नहीं। उसने फिर कंधे तक लटके बैग को पीछे किया और चेहरे पर आई बेचैनी को हटाने की कोशिश करने लगा। "कैसे दूँ वो बुरा तो नहीं मानेगी ना? कहीं दोस्ती भी ...नहीं-नहीं" उसने अपने अंदर एक और लड़के के होने का आभास महसूस किया। "दे ही देता हूँ अब नहीं दूँगा तो कब दूँगा।" वह उसके पास गया..फरवरी की धूप में वह ऐसी दिखती मानो कच्छ के रण मे पानी की चमक। उसने पास जाके थोड़ा हिचकिचाकर कहा.."एक्सक्यूज़ मी" ..
"हाँ क्या है",
 "कुछ नहीं "
वह फिर रह गया। उसे लगा यह वो लड़की नहीं जिसे वह चाहता है। बैग की चेन जो उसने खोल ली थी। बंद करके बैग कंधे पर टांग लिया। ऐसा लगता है मानो कल की ही बात हो। 
पिछले नौ सालों से आज के दिन हर बार डायरी के भीतरे छुपाये गये फूल को देख कर वह अपने कॉलेज के दिनों में खो जाता है। 

गुरुवार, 3 मई 2012

चिक्की

चिक्की के गाल पर हाथ फेरते हुए उसे ऐसा एहसास हुआ मानो यह स्पर्श महसूस किये उसे ज्यादा समय नहीं बीता। चिक्की जब मुस्कराता, हँसता,खेलता.रोता, उसके चेहरे और छातियों पर अपने हाथों से थपकी मारता, यह एहसास उसे फिर फिर होता और वह उन स्मृतियों में खो जाती जब उसने और चिक्की के पापा ने जीने मरने की क़समें साथ-साथ खाई थी। तब उसे 'हम बने तुम बने एक दूजे के लिए' फिल्मी गीत बेहद पसंद था। लेकिन समय हमारी सोच और धारणाओं के साथ साथ हमारे ख्वाबों को भी कितना बदल देता है। आज उसे अक्सर 'क्या हुआ तेरा वादा..याद है तुझको तून कहा था..' अपने दिल के अधिक करीब लगता है। आज चिक्की का जन्मदिन है। यहाँ आने से पहले उसने खुद को कितना समझाया था कि वह न जाए लेकिन जैसे उसका अपने पैरों पर बस ही न था जैसा पहले दिल पर नहीं था। पूरे रास्ते कॉलेज के दिनों की यादें उसे सालती रहीं।
चिक्की की मम्मी और उसकी दोस्ती हुए ज्यादा समय नहीं बीता है। जब उसे पता चला कि चिक्की की मम्मी अजय की ही पत्नी है, तब उसने खुद को इस सब से काटने की कोशिश भी की, लेकिन फिर रह गयी..
आज इस समय जब घर में पार्टी का माहौल है चिक्की अपनी इस नई आँटी को छोड़ने को तैयार नहीं है और वह भी कहाँ चाहती है कि चिक्की उसे छोड़े
कितना अरसा गुज़र गया है किसी को प्यार किये। आशा ने फिर धीरे से आँखे चुराते हुए चिक्की के गाल पर अपने होंठो का एक हल्का स्पर्श रख दिया। उसके गालो का स्वाद बहुत जाना पहचाना था।

बुधवार, 2 मई 2012

स्मृति में प्रेम

कॉलेज का विदाई समारोह क्या मेरे प्यार का भी आज आखिरी दिन है? उसके मन में यही सवाल था उस दिन। उसकी नज़रे उसे खोज रहीं थी पर वो जैसे कहीं नहीं थी वह फिर कैंटीन की छत से कॉलेज के कॉरिडोर की ओर भागा पर उसे वहाँ भी नहीं पाया। उसकी सहेली ने बताया कि वो कॉमन रूम में तैयार हो रही है। वह इंतजार करने लगा। फिर वह बाहर निकली साड़ी का रंग नहीं बता सकता बहुत डिफ्रेंट थी बिल्कुल उसकी आँखों की तरह। दुनिया में ऐसी आँखें किसी की नहीं थी। वो ऐसा मानता था। वह उसके सामने से गुज़र गयी। वह कुछ बोल नहीं पाया। उसके साथी खुश थे। पर क्या था जो उसके मन में चल रहा था? वह फिर उसे खोजने लगा। कॉलेज के पिछले तीन सालों में वह इतना कभी खाली नहीं हुआ जितना कि आज। उसे लगा कि दिल से कोई द्रव्य निकल रहा है उसने दिल पर हाथ रखा पर कुछ नहीं निकल रहा था वहाँ कुछ तेजी से बज सा रहा था। वह कैंटीन की छत पर गया उसने देखा कि वह रुपेश के साथ फोटो खिचवा रही थी वह बहुत खुश थी रुपेश हमारी क्लास का सबसे डैशिंग लड़का था। उस दिन उसे पहली बार लगा कि वह बेहद बदसूरत है। उसे लगा कि उसकी माँ को बचपन में उसके माथे पर काजल नहीं लगाना चाहिए था उसे पहली बार माँ से इतनी शिकायत हुई।