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मंगलवार, 18 सितंबर 2012

सियासी लप्रेक



नीलिमा ! हां निखिल. तुमने सुना आज एनडीटीवी पर रामविलास ने क्या कहा ? क्या कहा ? कहा कि जो अन्तर्जातीय विवाह करते हैं, उनके बच्चे को रिजर्वेशन मिलता है तो उससे जाति टूट जाएगी..तो मतलब ये कि लोग बच्चों का भविष्य बेहतर करने के लिए प्रेम करने लगेंगे ? प्रेम का इतना खूबसूरत निवेश निखिल..मतलब हमारे बच्चे भी ? लेकिन हमने ये सोचकर तो प्रेम नहीं किया न नीलिमा. हमने तो बस इसलिए प्रेम किया क्योंकि हमदोनों एक-दूसरे को पसंद करते हैं. हमारी सोच मिलती है. हमने तो कभी ये दावा नहीं किया कि हम प्रेम करके जाति व्यवस्था तोड़ रहे हैं..हम तो बस प्रेम कर रहे थे.अब पीछे क्या टूट रहा है क्या बन रहा है इसकी व्याख्या का काम तो सत्ता में बैठे लोगों का है न. लेकिन तुम बताओ निखिल, अगर सचमुच ऐसा हो जाए तो तुम उसे कैसे लोगे ? मेरा मतलब है उर्मि/ अव्यव को इसका लाभ लेने दोगे ? आखिर जाति के बंधन तोड़क
र प्रेम और शादी करने में भी तो हमें उतनी ही तकलीफ हुई और आगे होगी न जितनी कि एक दलित को दलित बच्चे को जन्म देने और परवरिश करने में होती है ? हम ऐसा करते हुए उंची जाति के होकर भी तो उसी तरह बहिष्कृत कर दिए जाएंगे न, अपने समाज से काट दिए जाएंगे ? उर्मि/ अवयव को कितनी जिल्लत उठानी होगी ? नाना,दादा सब किताबों तक होंगे. नीलिमा, क्या हमारा प्रेम इतना सियासी हो जाएगा कि समाजशास्त्र के सारे पाठ इसी से खुलेंगे और लिखे जाएंगे ? तुम कैसी-कैसी बातें कर रही हो ? फॉर गॉड सेक, तुम उसमें अभी के लिए कुछ ग्राम छायावाद के नहीं डाल सकती ? तुमने बाबा नागार्जुन की सिंदूर तिलकित भाल कविता तो पढ़ी होगी, उसे याद नहीं कर सकती ? हमने जो फैसला अपनी खुशी के लिए लिया, वो आनेवाली पीढ़ी के लिए निहायत एक स्वार्थ में लिया गया फैसला समझा जाएगा ? मुझे डर लग रहा है नीलिमा, हमारे इस खूबसूरत संबंधों के बीच समाज की दीवारें तो आएगी, ये जानता था लेकिन उन दीवारों में संसद की ईंटें भी चुनवायी जाएगी, सपने में भी नहीं सोचा था..उर्मि, तुम जब भी इस दुनिया में आना, सिर्फ प्रेम करना, अपने उस प्रेम को संसद के गलियारों की गूंज न बनने देना. अवयव, तुम यकीन तो कर सकोगे न कि हमने एक औलाद की सुविधाएं जुटाने के लिए प्रेम नहीं किया था ? प्रेम किया था क्योंकि ये दुनिया की सबसे खूबसूरत चीज है.( सियासी लप्रेक )

बुधवार, 29 अगस्त 2012

Dil, Dosti, etc in बारिश


अरे नीर,तुम अचानक ? फोन पर बताया नहीं कि तुम आ रहे हो ? और तुम तो बुरी तरह भीग गए..जींस से इतना पानी टपक रहा है..रुको मैं अभी तुम्हारे लिए कपड़े लेकर आती हूं..लेकिन तुम्हें तो मेरे कपड़े आएंगे नहीं..आइडिया ! खादी का कुर्ता-पायजामा.आ जाएगा तुम्हें..अभी लाती हूं..नीलिमा कपड़े लाने दूसरे कमरे चल देती है..जब तक कपड़े लेकर वापस आती तब तक नीर अपना काम कर चुका था. ये क्या पागलपंथी है नीर ? तुमने मेरी पोल्का डॉटवाली लोअर पहन ली और ये टीशर्ट. टीशर्ट पहनते वक्त पढ़ा भी तुमने कि इस पर क्या लिखा है ? पागल तो नहीं हो. इसे पहनकर मेट्रो से वापस अपने घर जाओगे? लोग हंसेंगे नहीं कि ये कौन लड़का है जो स्कीनी पोल्का डॉट लोअर में, लड़की के कपड़े में घूम रहा है. अरे नहीं, कुछ नहीं कहेंगे. किसकी मजाल है कि मुझे कोई कुछ कह दे. फिर कह भी दिया तो कह दूंगा- लड़की के कपड़े नहीं 
पहने हैं मिस्टर, इसी बहाने एक चुटकी नीलिमा को अपने साथ लेकर घूम रहा हूं और अगर लड़कियों ने ठहाके लगाए या एटीट्यूड में स्माइल पास की तो जोर से कहूंगा- जलन होती है देखकर ? तेरे उन घोंचू, बकरे सी दाढ़ी रखनेवाले से तो अच्छी ही दिख रहा हूं. और पढ़ लिया क्या लिखा है- इट्स माइ शो.वैसे एक बात कहूं, तुम्हें इस तरह की चीजें लिखी टीशर्ट नहीं पहननी चाहिए..इट्स माइ शो..आखिर तुम खुद अपने को मेल चावइज्म की कॉमडिटी बताती हो.
..बस-बस रहने दो. अब नुक्कड नाटक की रिहर्सल यही मत करने लगो. लेकिन तुम्हें पता है ये लोअर और टीशर्ट मैं पहले दो बार पहन चुकी हूं और धोने के लिए इसे खूंटी पर टांग रखी थी. नीर बिना कुछ बोले ड्रेसिंग टेबल की तरफ बढ़ता है और स्पिंज को इतनी जोर से दबाता है कि एक बूंद भी डियो उसके भीतर न रहे..लो अब तो कोई नहीं कहेगा न कि एक तो लड़की के कपड़े पहन लिए और उपर से इतने गंदे की स्मेल आ रही है. अरे पागल, ये तो उससे भी ज्यादा नौटंकी हो गई..कपड़े के साथ-साथ डियो भी लड़की की ? आखिर तू चाहता क्या है, रुक जाता दो मिनट तो क्या बिगड़ जाता ? मैं तो कुर्ता पायजामा ला रही थी न ? कुछ भी तो नहीं. बस ये कि मैं इस इलाके से गुजर रहा था तो इतनी तेज बारिश होने लगी कि मुझे समझ नहीं आया कि क्या करुं? पिछले दो घंटे से भीग रहा था. मन में आया कि कुछ कामचलाउ कपड़े लेकर किसी रेस्तरां के वाशरुम जाकर बदल लूं लेकिन फिर तुम्हारा ध्यान आया कि अरे नीलिमा भी तो इधर ही रहती है,वहीं चलते हैं. यकीन मानो, जब तुम्हारे यहां चलने का मन बनाया तो दिमाग में ये बात बिल्कुल नहीं थी कि अगर तुम्हारा ब्ऑयफ्रैंड होगा तो इसे किस तरह से लेगा? मेरे दिमाग में ये भी नहीं आया कि अगर तुम्हारी खूसट मकान मालकिन ने दूसरे कपड़े में बाहर निकलते देख लिया तो क्या सोचेगी ? मैं तो बस ये सोच रहा था कि निखिल की कोई न कोई टीशर्ट और लोअर तो होगी ही, पहन लूंगा..कौन पैसे फसाए..नहीं तो तुम्हारी ही जिंदाबाद. मुझे तुम्हारे लड़की होने के पहले दोस्त होने का ख्याल आया और मैं बस चला आया. एनीवे,मैं ये तुम्हारे कपड़े लौटा दूंगा या फिर उस बारिश और मौके का इंतजार करुंगा जब तुम फोन करके कहोगा- यार नीर ! मेरे कपड़े होंगे न तेरे पास..देख न आज मैं इधर जंगपुरा आयी थी और बारिश में बुरी तरह फंस गई.( बरसाती लप्रेक विद दिल,दोस्ती, एटसेट्रा)

शुक्रवार, 6 जुलाई 2012

खुरदरे इमोशन्स के बीच - विनीत कु्मार

  • ए रघु ! देख न मेरे ये जूते कैसे चमक गए. बिल्कुल नए जैसे. लग ही नहीं रहा ये चार साल पुराने जूते हैं. ऐम्बे लिक्विड तो सचमुच कमाल का है. अब मैं अपने सारे जूते इसी से धोया करुंगी. ओह रागिनी! तुमने इस सड़ियल से जूते पर इतनी मेहनत क्यों की ? तुमने तो इसे कब का छोड़ दिया था पहनना. फिर अब क्यों साफ कर दिया ? रघु,ये सड़ियल है. याद है, ये तुम्हारी पहली कमाई की निशानी है. उस दिन तुम्हें हिन्दी सेट्स बनाने के दस हजार रुपये मिले थे. मैं जॉगिंग के लिए कामचलाउ जूते लेना चाहती थी और कई बार तुम्हें मोनेस्ट्री जाने कहा था. तब तुम सेट्स पूरी होने के बाद जाने की बात करते थे और फिर जैसे ही पैसे आए, जबरदस्ती मुझे आदिदास के शोरुम ले गए थे और इसे खरीदा था. उस दिन तुम सचिन की तरह आदिदास की ब्रांडिंग कर रहे थे. पता है रघु. इसे मैं जब भी पहनती थी न, मेरी रफ्तार अपने आप बढ़ जाती थी. ह...ा हा. रफ्तार बढ़ जाती थी. रफ्तार तो इतनी बढ़ गई रागिनी कि देखते ही देखते तुम मुझसे मीलों दूर चली गई. रघु, तुमने कुछ कहा क्या ? नहीं रागिनी. मैंने कहां कुछ कहा. ओके. तो फिर आज शाम चलना न मेरे साथ. सोसाइटी के बार गेट पर जो भइया बैठते हैं न, उनसे इसके तलबे चिपकवा लेंगे. दस-बीस रुपये में अपना काम हो जाएगा.

    भइया, मेरे ये जूते चिपक जाएंगे ? हां मैंडमजी, चिपक क्यों नहीं जाएंगे ? तो फिर चिपका दो अच्छे से. रघु पास ही हाथ में जेब डालकर खड़ा हो गया था. रागिनी ने जल्द ही हाथ और जेब के बीच की खाली जगह में अपने हाथ डाल दिए थे. दोनों के बीच की हवा को रागिनी ने काफी कम कर दिया था. पब्लिक प्लेस में ऐसा करने से रघु अक्सर एम्बेरेस हो जाया करता है और रागिनी को ऐसा करने में मजा आता. ए रघु ! तुम मार्केट पर मेरे छूने भर से इतने शर्माने क्यों लग जाते हो ? ऐसे डरते हो कि जैसे मैं तुम्हारी रेप कर दूंगी. रागिनी ने इधर-उधर देखा और एक झटके में रघु को खींच लिया. ठीक से चिपकाना भइया जूते. ही ही ही ही. मैडमजी, ओइसही चिपकाएंगे, जैसे आप रघु भइया को. रागिनी, तुम भी न. एकदम से चीप हरकतें करने लग जाती हो.

    इ लीजिए मैडमजी. आपका जूता चिपककर रेड्डी. थैंक्स भइया. अच्छा ये तो बताओ, ये जूते फिर से उखड़ तो नहीं जाएंगे ? मैं तो इसे लेकर मोतिहारी चली जाउंगी और अगर उखड़ा तो फिर तुम तो आओगे नहीं मोतिहारी चिपकाने. मैडमजी. एगो बात पूछें ? आप जब इ जूता लिए थे हजार रुपया से उपर देकर तो सेल्समैने से इ पूछे थे कि एतना मंहगा जूता ले रहे हैं, उखड़ तो नहीं जाएगा? औ आप पन्द्रह ही रुपया में हमसे इ बात पूछ रहे हैं..रघु अंदर से खिसिया रहा था. रागिनी को इतनी बातें करने की जरुरत क्या थी ?...कोई बात नही्ं मैंडमजी, रघु भइया को बता दीजिएगा कि चिपका हुआ है कि मोतिहारी जाके उखड़ गया ? 

रविवार, 24 जून 2012

लप्रैक ऑन द गैंग ऑफ बासेपुर - विनीत कु्मार

छोड़ दो न रागिनी. इसके लिए प्लैटिनम टिकट लेने की क्या जरुरत है? फिल्म में तो ऐसा कुछ है भी नहीं कि इस सीट की जरुरत होगी. दो-चार ही तो ऐसी सीन है, स्कीप कर जाएंगे. उसके लिए 140 रुपये ज्यादा देने की क्या जरुरत है ? ओह कम ऑन रघु. लोग बता रहे हैं कि अनुराग की देवडी में हीरोईन गद्दा लेकर खेत जाती है, इसे देखने के लिए घर से गद्दा लेकर जाना होगा और तुम्हें प्लेटिनम टिकट में ही दिक्कत हो रही है..बकवास करते हैं सब. अच्छा सुनो, जब गद्दा ही लेकर..तो छोड़ देते हैं न ये फिल्म..मेरा मतलब है घर पर ही रहते हैं..हां,हां खूब समझती हो तुम्हारा घर पर रहना. लेकिन क्या पता, तुम्हारे साथ में दिल्ली में मेरी ये आखिरी फिल्म हो..मोतिहारी में हम थोड़े ही न जाएंगे सिनेमा..सीट पर तो बैठ जाएंगे पर हाथ कहां रखेंगे रघु ? लेकिन मैं तुमसे नाराज हूं रागिनी. तुमने इस फिल्म को देखने से पहले ही डिमीन कर दिया. क्या सिर्फ यही है सिनेमा में ? सत्ता के भीतर की बनती नाजायज सत्ता का जिक्र नहीं है..पीयूष मिश्रा, स्नेहा खानवलकर के संगीत को ऐसे देखोगी सिर्फ गद्द तक समेटकर ? तब तो बहसतलब में वरुण की बात से बहुत एम्प्रेस हो गई थी और आज सिर्फ गद्दा.. छीः, आज मुझे अफसोस हो रहा है ये कहने में कि तुम वह लड़की हो जिसके साथ हमने गॉडफादर,सत्या, एनॉनिमस देखी..सुबह तुमने खराब कर दी रागिनी तुमने..ओह रघु,मैं डिमीन नहीं कर रही. मैंने तो ऐसा इसलिए कहा कि तुम थोड़े एक्साइटेड हो, पैम्प करने के लिए बस. अनुराग और उसके काम को मैं बिग सेंस में देखती हूं और इस फिल्म को भी,डॉन्ट वी पैनिक प्लीज..अनुराग ने ये फिल्म हम कपल के बीच दरार पैदा करने के लिए थोड़े ही न बनायी है ?ऐ रघु, एक बार देखो न मेरी तरफ, अपनी वूमनिया की तरफ..तुम फील करो न कि तुम्हारी रागिनी मोतिहारी से विदा होकर सीवान जाएगी तो कैसी दिखेगी ? अलगनी पर टंगे मानपुर,गया के गमछे से पल्लू बनाकर किनारे को बीच की दांत से दबा लिए..

बुधवार, 20 जून 2012

लप्रेक,विद हैप्पी एंडिंग


चायवाले ने उनसे बिना पूछे ही कांच के गिलास में दो चाय बढ़ा दिए थे.अरे नहीं माधो, रागिनी अब अफसर बन गयी है,आज सीसीडी में कॉफी पिलाएगी कॉफी. तू आज रहने दे. माधो को 12 रुपये की बिक्री की चिंता नहीं थी..हुलसकर कहा. अच्छा माने इहौ अफसर बिटिया. वाह भइया, हमरा चाय पीके मैडमजी अफसर बन गई है, इससे खुश की बात औ क्या हो सकता है..अच्छा तो है, एक-एक करके सब हमरी चाय पीके धीरे-धीरे सीसीडी में घुस जाते हैं. औ तुमरा क्या हुआ भइया, तुम कब घुसोगो सीसीडी में ? रागिनी के यूपीएससी क्वालिफाई होने की खुशी के बीच माधो का ये सवाल इतनी तेजी से घुलकर उदासी में तब्दील हो जाएगी,रघु इसके लिए तैयार न था..रागिनी माहौल को हल्का करना चाहती थी. अरे माधो भइया, आज तुम भी चलो न हमारे साथ सीसीडी. हम..धत्त मैडम. हम आपदोनों के बीच जाकर क्या करेंगे,उहां आप जाइए,आराम से सोफा में धसिए औ रघु भइया से पूछ-पूछके शक्कर डालिए औ काफी बनाइए..तो तुम यहां क्या करते थे हमारे बीच ? हियां ? हियां चाय ढारते थे औ रघु भइया और आपकी आंखों के बीच की आवाजाही देखते थे..पवन चक्की जैसी फुक्क-फुक्क आती-जाती नजरें, सैइकिल जैसी टकरातें नजरे देखते थे और भीतरे-भीतर आशीष देते थे कि दुनहुं का एके साथ कुछ हो जाए. ओह माधो भइया,कमऑन..अब तुम भी कविया गए. काहे, पिछला चार महीना से रेनु,निराला,शमशेर का खिस्सा-चर्चा करके हमरा भेजा निचोड़ती थी दुनहुं मिलके त उस समय नहीं समझ आता था कि माधो भइया को कुछ बुझाता है भी कि नहीं. हम तुमको बहुत मिस्स करेंगे माधो भइया. चलोगे हमारे साथ जहां पोस्टिंग होगी? हमको छोडिए रघु भइया को लेले जाइए. उ आपके बिना तैयारी करेंगे..हहरके मर जाएंगे इ मुकर्जीनगर के जंगला में.क्यों रघु,तुम क्यों चुप्प हो? कुछ नहीं रागिनी,सोच रहा था तुमने आज पहली बार मुझसे गिफ्ट मांगी है, क्या दूं ? अच्छा, तुम..तुम मुझे माधो भइया की इस दूकान का एक टुकड़ा दे दोगे, सरकारी क्वार्टर की ड्राइंगरुम में बहुत खूबसूरत लगेगी. है न. हमारे रोज मिलने की जमीन,सपने बुनने की जमीन और माधो भइया को पकाने की जमीन..

लप्रेक विद गिल्ट

फेंक दो न रागिनी इस गाइडबुक को ? क्या करोगी रखकर ? तुम्हें नहीं पता कि एन्ड्रायड फोन को कैसे हैंडल करते हैं,वेवजह सामान बढ़ाने से क्या फायदा ? नहीं रघु,इसे अपने पास रखते हैं. सोचो तो सही,मोबाईल बनानेवाली कंपनी अपने मोबाईल को कितना बेशकीमती समझती है? हम कहते हैं हमारी जिंदगी दुनिया की सबसे कीमती चीज है लेकिन हमारे पास कोई भी ऐसी गाइडबुक है जिसे पढ़कर हम समझ बढ़ा सकें कि हम इसे कैसे चलाएं लेकिन देखो मोबाईल की है. ओह रागिनी,तुम तो राजपाल यादव जैसी बातें करने लगी. मतलब ? मतलब ये कि राजपाल यादव ने चुटकुला सुनाया था एक बार- एक ग्राहक से केलेवाले से कहा. मैं रिलांयस से ज्यादा अमीर हूं. ग्राहक हंस दिया. केलेवाले ने कहा- अच्छा बता मेरा एक केला कितने का ? ग्राहक ने कहा- दो रुपये का. और रिलांयस की एक कॉल ? चालीस पैसे की. तो बता कौन अमीर ज्यादा हुआ ? रागिनी तुम यूपीएससी के बाद इन दिनों कल्चरल मैटिरियलिज्म पढ़ने लगी हो क्या ? हां रघु..दुनिया के बारे में अपनी समझ बढ़ाने के लिए. एक तरह से कहो तो सालों से विचारधारों और सामाजिक प्रतिबद्धता के तर्कों को झूठलाने के लिए. उससे दूर भागने के लिए.अपने उन वादों को तोड़ने के लिए कि हम दो सलवार सूट में काम चलाएंगे लेकिन दुनियाभर की किताबें पढ़ेंगे.पीवीआर नहीं जाएंगे,पायरेटेड सीडी देखेंगे. पर क्यों रागिनी? इसलिए रघु कि ब्यूरोक्रेसी की दुनिया हमें ऐसा करने नहीं देगी, अब शो ऑफ ही हमारी मजबूरी और विचारधारा होगी रघु. कन्ज्यूम करने की आदत ही हमारी शान होगी. सॉरी ग्राम्शी,मैंने तुम्हें सिर्फ सिलेबस की तरह पढ़ा,जीवन में ला न सकी.

लप्रेक, ए लिटिल विट पॉलिटिकल - विनीत कु्मार

जी न्यूज की हेडर देखकर पोल्टू दा ने दांत पीसने शुरु कर दिए थे. दो जूता मारो स्साले इन चैनलों को. अभी से ही लिख रहा है महामहिम प्रणव. सुलक्षणा अचानक से उठकर चल दी थी. पोल्टू दा एकदम से खुश हो गए. सोचा, सुलक्षणा को ये हेडर इतनी बुरी लगी कि वो इसे देख भी नहीं पा रही है. टाटा स्काई रिमोट की लाल बटन को दांत पीसते हुए दबाया और सुलक्षणा की तरफ बढे. आमिओ देखते पारि नाय..सुलक्षणा को टाइट हग देते हुए जोर से किस्स किया. आज बहुत प्यार आ रहा था सुलक्षणा पर..औऱ वैसे भी हम जिस बात को पसंद नहीं करते, पार्टनर भी न करे तो प्यार दुगुना हो जाता है...अपने कमरे में आकर सुलक्षणा ने आठ साल पुरानी अटैची निकाल ली थी..रंगीन अखबार इतिहास के गडढे में धंसकर मटमैला हो गया था. आनंद बाजार का शहर/आसपास का पन्ना निकाला. उसने अभी तक पूरा अखबार ही रखा था, उसकी कतरन भर नहीं. जूड़े में बेली का गजरा, लाल पाढ़वाली छपा साड़ी, बड़ी सी बिंदी, पैरों में घुंघरु, चेहरे पर मुस्कान और बंगाल के बड़े नेता प्रणव दा से पुरस्कार लेती हुई. सुलक्षणा उस तस्वीर को फिर से चूमती है. वो खुश होती है कि जिस प्रणव दा ने उसे आज से आठ साल पहले पुरस्कार दिया, अब राष्ट्रपति बनने जा रहे हैं. जान, एटा देख न एकटू, आमार प्रणव दा..पोल्टू दा का इंटरवल के बाद फिर से दांत पीसना जारी था.

रविवार, 17 जून 2012

लप्रेक विद दोषारोपण


बांह,गला,कमर,घुटने..एक के बाद एक टेलर इतनी तेजी से इंचटेप रागिनी पर टच करता जा रहा था कि जैसे वो उसके कुर्ते की नाप लेने के बजाय खचर-खचर कपड़े काट रहा हो. काउंटर से थोड़ी ही दूर पर खड़ा रघु जो पिछले पांच मिनट तक काला-खट्टा में रमा हुआ था,गोले जमीन पर चू जाने के बावजूद भी टंठल को चूसे जा रहा था, एकटक रागिनी को देख रहा था. अब वो मल्कागंज की इस सड़ियल सी गली में क्यों आएगी कुर्ते की नाप देने ? इतने नौकर-चाकर होंगे कि जरुरत ही नहीं पड़ेगी. ओए रघु,कहां खो गया तू ? रागिनी की आवाज से रघु अकचका गया और फिर डिजाईन बुक पर नजरें टिका दी..नहीं,चौड़े गले का कुर्ता अब रागिनी के लिए सही नहीं होगा. क्यों न इस बार उसे नेहरु कट ट्राय करनी चाहिए? उसने डिजाइन का वो पन्ना मोड दिया और आगे बढ़ गया. वैसे सिद्धि जैसे कुर्ते पहनती है,वो भी बहुत प्यारे लगेंगे.उस पन्ने को भी मोड़कर आगे बढ़ गया.कुछ और ट्राय किया जाए..बढ़ता गया-बढ़ता. उसे पता तक नहीं चला कि कब पीछे खड़ी रागिनी उसकी इस हरकत पर नजरें टिकायी है. वाह बेटाजी, अभी तक तो तुम जब भी टेलर आए मेरे साथ,दस फिट की दूरी पर खड़े नजर आते थे.लाज आती थी तुम्हें यहां खड़े होने में और अब मैं दिल्ली से जा रही हूं तो खड़े क्या डिजाइन तक चुनने लगे. सही जा रहे हो रघु. मुझे नहीं लगता मोतिहारी जाकर ज्वायन करते-करते तुम ये भी याद रखोगे कि रागिनी नाम की कोई लड़की मेरी जिंदगी में थी.

शनिवार, 2 जून 2012

उंगलियाँ


यह लघुकथा जिसे विनीत कुमार लघु प्रेम कथा कहना ज्यादा पसंद करते हैं हमारे लिए विनीत ने हमारे फेसबुक समूह के लिए लिखी है। इस समूह के लिए यह उनकी पहली लघु कथा है। इस कथा का शीर्षक उनके द्वारा हमें अभी उपलब्ध नहीं कराया गया था सो मैंने ही इसका शीर्षक उंगलियाँ दे दिया। जिसमें बाद में संपादन की गुँजाइश है। खैर विनीत की यह लघु कथा भारत बंद के दौरान एक जोड़े की मनःस्थिति का ही नहीं बल्कि उस मनःस्थिति से उपजे उनके अपने अनुभव का भी बयान है।- मॉडरेटर

मयूर विहार फेज-1 स्टेशन पर प्रेमी जोड़े के आपस में गुंथे हाथ उस धक्का-मुक्की में जाने कब तितर-बितर हो गए, उन्हें भी पता नहीं चला. जिन उंगलियों को वो मिनटों वो नाखून से जड़ और जड़ से नाखून तक सहला रहा था और बीच-बीच में मूंगे की अंगूठी पर ठिठक जाता, वे उंगलियां मुठ्ठी बंधकर चीनी के मरीजों,अधेड़ फ्रस्टू अंकलों को धकिआने में मजबूरन व्यस्त हो गयी. इधर उसकी अरबी जैसी मोटी-मोटी उंगलियां अचानक से बेजान हो गयी.आखिर जींस की पॉकेट में हाथ डालने के अलावे चारा क्या था. भारत बंद का सबसे गहरा असर रागिनी और रघु को ही हुआ था. मेट्रो भी गजब घिनौनी चीज है न. जिसे हम छूना चाहते हैं,छूते रहना चाहते हैं वो छूट जाते हैं और जिन्हें छूना क्या,उसके पास से गुजरनेवाली हवा से भी परहेज करते हैं,वो है कि लसड़ाने लग जाता है..यमुना बैंक,इन्द्रप्रस्थ,मंडी हाउस,बारहखंभा..हां उंगलियों में फिर से जान आने लगी थी.वो जींस की पैंट से उछलकर फिर से उनमें गूंथने लगी थी,उसे स्पर्श नहीं, नरमी चाहिए थी,बंदी की झुलसन से मुक्त होने के लिए,सांस लेने के लिए. राजीव चौक तक आते-आते मयूर विहार फेज-1 की तरह अरबी सी उंगलियां,भतिया ककड़ी सी उंगलियां एकाकार होने लगी थी. स्टेशन पर दर्जनों युगल इसी मुद्रा में मौजूद नजर आए बल्कि रोज से कहीं ज्यादा. आ मेट्रो स्टेशन इस मामले में ज्यादा उदार नजर आयी. डीटीसी,ओटो और कारों में टुकड़ों-टुकड़ों का स्पर्श यहां आकर बहुमत हो गया था.