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शनिवार, 13 अप्रैल 2013

स्मृति में प्रेम (रिंग सैरेमनी के बाद)


उस रात नींद कहीं उचट गई थी, ऐसा अक्सर होता था मेरे साथ। पर उस दिन कुछ ज्यादा ही देर तक जागा रहा। आँखें बंद कर देर तक बिस्तर पर पड़ा रहा, पर दिमाग जग रहा था। दिल में धड़कन नहीं कुछ और था जो बज रहा था। समझ नहीं आ रहा था कि ये क्या है मैं क्यों इतना बुझा-बुझा महसूस कर रहा हूँ। यह कल की रात थी। कल हमें उसने मिलने के लिए बुलाया था। वह आई हम देर तक मैक-डी में बैठे रहे। उसने आते ही पहले मिठाई का डिब्बा आगे कर दिया फिर अपनी उंगली, जिसमें उसकी सगाई की अंगूठी थी। मैंने पूछा डायमण्ड की है? उसके चेहरे की मुस्कराहट थोड़ी और बढ़ गई। मुझे लगा जैसे वो यही जताना चाहती है। कुछ देर बाद उसने अपना कैमरा निकाला और अपनी रिंग सैरेमनी की तस्वीरें दिखाने लगी, तब मुझे पहली बार महसूस हुआ कि उसने आज की मीटिंग के लिए बड़ी प्लानिंग की है।
तस्वीरों को देखते हुए मैं काफी देर तक चुप रहा शायद उस वक्त मैं बहुत बोलना चाहता था। वो अंदर से बहुत खुश थी पर ऊपर से ऐसा न दिखे इसी जुगत में लगी थी। हर बार की तरह मैं फिर से फ्लैश बैक में चला गया जहाँ उसका एक अदद जामनी रंग का घुटनों से नीचे तक का गर्म सूट (जिसे वो हफ्ते में चार दिन पहनती), टूटी सैंडल और चेहरे की मासूमियत कॉलेज के सामने के ग्राउंड में धूप सेंकने आया करते थे। कभी कभी सोचता हूँ क्या जिंदगी सिर्फ फ्लैश-बैक में जाने और वापस लौटने का नाम है?              

शनिवार, 8 दिसंबर 2012

अर्धांगिनी

बचपन में मास्टर जी ने कहा - मूर्ख। जानता है मूर्ख किसे कहते है। और संटी हाथों पर जड़कर चलते बने। ये फ्लैशबैक के दिन थे। फिर बचपन खत्म हुआ और हम कॉलेज में पहुँच एकाएक जवान हो गये। असल कहानी यहाँ शुरु हुई..

हमारे पास सिवाय मान जाने के कोई चारा नहीं था। हम सब दोस्त(एक के अलावा) आखिरकार मान गये। हमने अपने दिल को समझाया और अपनी राह को एक खूबसूरत मोड़ दे दिया। पर हम परेशां थे कि ये सारे मोड़ उसी मंज़िल की ओर फिर फिर क्यों बढ़ जाते हैं जिसे हम छोड़ना चाहते है। फिर हमने तय किया कि हम इन मोड़ों को भी अपनी राहों से हटा देंगे। हालांकि हम ऐसा कर नहीं सकते थे फिर भी हमने पूरी कोशिश की। हमने भरसक कोशिश की कि हम उसे भुला दें। पर वो हमारे जहन में एक बुरे सपने की तरह हावी थी। हम उन दिनों को कोसने लगे जब हमने उसे एक सुंदर, सुशील सभ्य मानने की गुस्ताखी की थी। हमारे आने वाले दस साल इस गुस्ताखी की सजा बने। ह
मने सजा पूरी ईमानदारी से भोगी। आज सन २०१२ में जब हमारा एक दोस्त डिप्टी सुपरिटेंडेंट है हमने जानना चाहा कि हमारी गलती क्या थी? उसने फिलॉसफी झाड़ते हुए कहा गलत युग में गलत न होना भी एक गलती है। अरे ये क्या बात हुई। हाँ टोटल ईमानदारी भी अपने आप में एक बेईमानी है। ये वही दोस्त है जो एक समय हम सबमें सबसे ज्यादा निकम्मा माना जाता था। जिसके बारे में हमें लगता था कि ये तो गया इसका क्या होगा। न पढ़ता है न पढ़ने देता है। हम किताबों में डूबे रहते ये शहर की खाक़ झानता, लोगो से बतियाना इसका प्रिय शगल था। २००५ के बाद से हमारी मुलाकात नहीं हुई थी हमने भी ध्यान नहीं दिया सोचा होगा साला कहीं। फिर पिछले साल मिला हमारी गुस्ताखी को अपनी अर्धांगिनी बनाये हुए। उस दिन हमें मूर्खता की परिभाषा मालूम हुई।

ह्यूमिडिटी


वो दिन रोज की तरह नहीं था। उस दिन हवाओं में कुछ ज्यादा ही नमी थी। ऐसा मैंने अपने बचपन में भी महसूस किया था। उस दिन भी विश्वस्त सूत्रों के मुताबिक मौसम समाचारों में शहर में ह्यूमिडिटी की बहुतायत बताई गई थी लेकिन एकाएक शहर में ये ह्यूमिडिटी, ये आद्रता कैसे बढ़ गई इसका जवाब उनके पास भी नहीं था। वे सोच में मग्न थे कि हम इसका कयास तक कैसे नहीं लगा सके? चीज़े एकदम से बदल गई थी कुछ लोग दुखी थे लेकिन चेहरे पर सुख का लबादा चिपकाये थे बहुत सारे लोग खुश थे लेकिन चेहरे को दुखनुमा बनाये थे। कुछ लोग और थे जो न तो खुश थे न दुखी। वे खुश और दुखी दिखने के चुनाव में फँसे हुए थे। सन् १९९२ के बाद से हर बार दिसंबर की ये सर्द सुबह ऐसे ही नमी लिए आती है। इस नमी की तारीखें अब दिनों दिन बढ़ने लगीं है साथ ही तीसरे दर्जे के कुछ लोगों की तादात भी दिनोंदिन बढ़ रही है। कुछ लोगों के लिए ये तारीख़ एक वाकया है। कुछ के लिए एक घटना-परिघटना-दुर्घटना। तो कुछ के लिए किसी महापुरुष का परिनिर्माण दिवस। मेरे लिए ये दिन मेरे बचपन के साथी अफसाना और फिरोज़ की विदाई का दिन है। क्योंकि इसी दिन की दोपहर के बाद उनके पिता ने एक हिंदु बहुल इलाके को छोड़ने का फैसला लिया।

रविवार, 15 जुलाई 2012

एड हॉक इंटरव्यू

कमरे में घुसते ही एक अजीब सा सन्नाटा था। सामने बैठी मैडमें जिनके हाथ में एक एक पर्चा था आपस में खुसुरफुसुर में मगन थी। वह सकुचाती हुई भीतर घुसी। उसने सिर और आँखें नमस्ते के अंदाज़ में झुका दीं।
एड हॉक पैनल में नाम है तुम्हारा ? (उनमें से एक ने पूछा)
जी मैम। (उसने सहम कर जवाब दिया)

हाँ तो तुम्हारा पीएच.डी का काम किस विधा पर है।
मैम नैमिचंद्र जैन की रंग समीक्षा पर।

अच्छा तो बताओ भक्तिकाल के केंद्र में क्या है? (अब की बार कोने में बैठी उम्रदराज़ मैडम ने पर्चे पर नज़रे गड़ाते हुए पूछा)।
मैम भक्ति।
ओह।(मुँह बिचकाते हुए बराबर वाली मैडम ने यह भाव व्यक्त किया)

विपर्य किसे कहते है कहानी और उपन्यास में क्या अंतर है? (दूसरे कोने में बैठी मैडम ने तुरंत अगला सवाल दागा)
वह अपने बी.ए और एम.ए. के दिनों की स्मृतियों मे खो गई।

अगला सवाल पूछने के लिए दोनों किनारों की मैडमों ने बिल्कुल मध्य में बैठी मैडम की ओर देखा जो अपने मोबाइल पर नंबरों को रगड़ने में मगन थी।
ओह अच्छा ये बताओ भक्ति के ...( ये पूछ चुके है उनके बराबर में बैठी एक अन्य मैडम ने बीच में टोकते हुए कहा।)
ओह सॉरी हाँ तो आख्यानात्मक कविता और प्रगी...परगीता ...ये क्या लिखा है फोटोकॉपी वाले ने सही से प्रिंट नहीं किया।( प्रगीतात्मक। , एक अन्य मैडम ने कानों मे कहा) हाँ प्रगीतात्मक कविता किसे कहते है? (मैडम ने पर्चे को अजीब तरह से आँखों के करीब लाकर पूछा)
सॉरी मैम मुझे तो ये अवधारणा ही समझ नही आई। कविता तो कविता होती है उसे आख्यानात्मक और प्रगीतात्मक जैसे बोझिल शब्दों से जोड़ने की जरूरत ही क्या है?

ओह तो तुम क्लास में क्रांति करना चाहती हो। स्लैबस के खिलाफ बच्चों को खड़ा करना चाहती हो।
नहीं मैम मै तो। बस

नहीं नहीं बोलो
बाकि मैडमों ने ध्वनि मत में उस मैडम का साथ दिया।

अच्छा बताओं विरुद्धो का सामंजस्य किसकी रचना है?
उसे लगा कि उसका गला कोई दबा रहा है उसे उस कमरे में अजीब सी घुटन महसूस हुई। कमरे के सन्नाटे उसके कानों में चीखने लगे। उसने कानों पर दोनो हथेलियाँ कस लीं और उठने का प्रयास किया पर उसने पाया कि उसके नीचे पैर ही नहीं हैं।

रविवार, 24 जून 2012

मुर्गी की टांग

नौसीखिए गुलशन ने आव देखा न ताव बस बाइक भगा दी और घर की तरफ दौड़ाई। उसके दिमाग से लाली की छवि एकदम से बदलकर मुर्गी की टाँग में समा गयी। घर आके उसने जल्दी से बाइक घर में घुसेड़ी और छत पर चला गया। मैं उसका जिग्री दोस्त हूँ ऐसा वो अक्सर कहता रहता। लेकिन ऐसे मौकों पर वो छत पर भाग जाता। लाली रामदीन टांक की एक लौती लड़की थी। जिसे इम्पैस करने के लिए वो भाई को दहेज में मिली नई नवेली बाइक जबरन दिखाने ले गया था। उसने मुझे ये बताया था पर उसके चेहरे का पसीना कुछ और बयाँ कर रहा था। क्या हुआ मैंने पूछा, कुछ नहीं उसने कहा और गली के छोर पर देखने लगा। ऐसा बदहवास मैंने उसे इससे पहले कभी नहीं देखा था। हमारा मोहल्ला उस वक्त बामन बनियों का मोहल्ला हुआ करता था और गुलशन को सामने के मोहल्ले की लाली पसंद आई थी वो मोहल्ला जहाँ न जाने के लिए हमारे घरवालों सख्त हिदायत दे रखी थी। पर ये लड़कपन का पहला प्यार था सुबह वह अपने मुर्गे-मु्र्गियों को दाना डालने के लिए बाहर निकलती थी यही वक्त चुना था उसने। मुझे पता था ये बवाल तो होना ही एक ना एक दिन। बामन का लड़का और चमारों की लड़की को ..। मोहल्ले की नाक नहीं कट जाएगी। गली के छोर से आवाजे आनी शुरु हुई। 
यही गली है चाचा..यही भागा था वो लोंडा। ढ़ँढो यहीं होगा। वो रा चाचा. वो रा. छत पे छुपे गुलशन पर उनमें से एक की नज़र पड़ी। गुलशन भागा। मुझे पता था लाली के चक्कर में ये तगड़ा फँसेगा एक दिन। पर नहीं पता था कि वो दिन इतनी जल्दी आ जाएगा। ये तो शर्मा का घर है। उस समय जीने का दरवाजा बाहर की ओर था खींच कर लाने में कोई तकलीफ नहीं हुई थी उन्हें। तबियत से धुलाई की गई थी। मैं अच्छी दोस्ती का फर्ज निभा दूर से देख भर रहा था ये सब। मैं भागा आंटी गुलशन को वो लोग पीट रहे हैं इतने में मोहल्ला इकट्टा हो गया। साले उसकी टाँग तोड़ के भाग आया। रुकता तब बताते। बात कुछ नहीं थी पर बहुत बड़ी थी। लाली का सुंदर चेहरा उसके चाचा के चाँटों ने धुमिल कर दिया था और उसकी जगह मुर्गी की टूटी टाँग घूम रही थी। उस दिन के बाद गुलशन कभी उस सड़क से नहीं गुजरा। उसने छत से देखा लाली का भाई दाँत में फँसा लैग पीस का कतरा निकालने में व्यस्त था। लाली नीचे माचिस की तीली खोजने गयी हुई थी। मैं दोस्त की पिटाई पर पहले खौफ़ में था पर अब अंदर ही अंदर हँस रहा था कि साले मुर्गी की टाँग टूटने पर तेरा मुँह सुजा दिया उन लोगों ने। अगर मैं बता दूँ कि तून लाली का मुँह चुमा हुआ है तो। मजा आ जाएगा। गुलशन ने उस दिन के बाद लाली के बारे में मुझसे कोई बात नहीं की। कॉलेज में आकर एक दोस्त ने कहा कि लड़कपन का प्यार भी कोई प्यार होता है। हा हा हा

रविवार, 17 जून 2012

ताई

ताई की डैथ मेरी माँ के मरने के एक महीने के भीतर ही हो गयी थी। वो बाथरूम में नहाते वक्त मृत पायी गयी थी मेरी ताई की लड़की ने मुझे आवाज़ दी थी मैं ही अपनी गोद में उनके निरवस्त्र शरीर को बाथरूम से उठाकर कमरे में लाया था सविता पास खड़ी रो रही थी और मैं ताई की आँखों के नीचे एक लंबी धार के दाग को देख रहा था। उनकी आँखे पूरी तरह बंद नहीं थीं थोड़ी खुली हुई थी जिसकी वजह से मुझे उनके शरीर में जान होने का भ्रम बार बार हो रहा था। मैं पहला शख्स था जो बाथरूम में उनके दीवार से पीठ टिकाए बैठे शरीर को उठा कर लाया था वह इमेज काफी लंबे समय तक मेरे जहन में ताई के मरने के बाद भी जिंदा रही। ताई ने एक मग पानी भी अपने शरीर पर नहीं ड़ाला था। उनका शरीर बिल्कुल सूखा था सविता का कहना था कि ताई आधे घंटे से बाथरूम में ही थीं। कहते हैं उन्हें हर्ट अटैक आया था। सविता ने मुझे बताया था कि कोई बात तो थी नहीं बस पापा(ताऊ) से कहा-सुनी हुई थी और उन्होंने ने थोड़ा पीटा था बस उसके बाद (मम्मी)ताई नहाने चली गई पर सविता का कहना था कि ऐसा पहली बार था कि पापा के मारने पर भी मम्मी रोई नहीं थी और सीधा बाथरूम में नहाने चली गई थी। लोगो का कहना है कि ताई हमारे यहाँ की सबसे भली महिला थी अभी पच्चीस दिन पहले मेरी माँ की डैथ पर लोगों ने ऐसा ही कहा था। लेकिन मुझे लगा कि मरने और कहने के बीच में बहुत कुछ अनकहा रह गया।

बुधवार, 30 मई 2012

अस्पताल में एक शाम


अभी पीछे मुड़ा ही था कि फिर वो आवाज़ दोबारा आई। अब एक बार फिर देख लो शायद नेटवर्क आ गया हो। एक बार तो लग ही जाएगा। आंटी बैल तो जा रही है पर कोई उठा नहीं रहा। एक बार और बेटा ये मेरी बहू का नम्बर हैं। पर आंटी कभी बैल जाती है तो कभी कोई फोन काट देता है मैं क्या करुँ। कितनी कॉल कर चुका हूँ लो अब आप ही कर लो। अच्छा बेटा गुस्सा मत हो ले ये नंबर मिला ये मेरे बेटे का हैं। वो ज़रूर उठाएगा उन्होंने बड़े उम्मीद भरे लहज़े में कहा और मैंने फिर मिला दिया मैं नंबर मिला रहा था और वो पेट पर हाथ रख कुछ बड़बड़ा रहीं थी। पता नहीं लेकिन उस बड़बड़ाने में दर्द का अहसास ज्यादा था। वो क्या था। नंबर लगा हाँ एक सैक लीजिये बात कीजिये। बेटा सुबह से फोन मिला रहीं हूँ बहू फोन नहीं उठा रही सब ठीक तो हैं न? मै हैरान ये क्या.. 
फिर उन्होंने कहा बेटा वो सुबह से तू भी नहीं आया सुबह नाश्ता देने भी कोई नहीं आया। इस लड़के ने अपने बिस्कुट अभी खिलाए हैं बड़ा भला लड़का है । बहुत भूख लग रही हैं। दवाई भी नहीं खा सकती न? वो बड़े दुख भऱे लहजे में अपने बेटे से गुजारिश जैसे किये जा रही थी और वहाँ से आवाज आनी बंद हो गयी। आंटी को लगा फोन कट गया। उन्होंने मेरे हाथ में मोबाइल पकड़ाया। मैंने पूछा आंटी कुछ ला दूँ आपको। पापा के लिए खिचड़ी लाया था आप भी ले लो ये तो बहुत सारी हैं पापा इतनी नहीं खाते। उन्होंने लेने के भाव में मना कर दिया में खिचड़ी वहाँ रखके बराबर वाले बैड पर पापा के पैरों के पास बैठ गया। अब आंटी के हाथ पेट पर नहीं थे। बल्कि आँखों को पोंछ रहे थे। 
मैं पापा के पास बैठा नौ साल पहले के फ्लैश बैक में गुम हो गया इसी अस्पताल में जब मेरी माँ इस सरकारी अस्पताल में थी। मैंने जिंदगी का एक बहुत बड़ा ज्ञान पाया था कि आदमी को गरीबी नहीं मारती बल्कि गरीबी में बीमारी मारती हैं।

सोमवार, 7 मई 2012

जो कभी हावी था दिलो-दिमाग पर...

दोपहर जिसमें सर्दियों के समापन का संकेत था। धूप पेड़ों से छनकर उस हरे लोहे के बैंच पर बैठी निशा के गालों और बालों को उम्रदराज़ बना रही थी। निशा के होंठो पर जमी पपड़ी कुछ कहना चाह रहीं थी। आंखें नीचे की ज़मीन में कुछ ढ़ंढ रही गिलहरी को घूर रहीं थी। चेहरा एक ही जगह जमा हुआ था लेकिन दिमाग में कुछ चल रहा था। मालियों की खुरपी माहौल को अशांत किये हुए थी। लंच होने ही वाला था शायद इसलिए वे अपना हाथ का काम समेट लेना चाहते थे। कौओ और गिलहरियों ने पेड़ों से उतरना शुरु कर दिया था। मिट्टी पर अभी पानी छिड़का गया था जिससे उठी खुशबू अब भी वसंत को क़ायम रखे थी।
निशा के बराबर में काफी देर से चुप बैठे विनोद ने पूछा - "क्या हुआ, कुछ तो कहो, चुप क्यों बैठी हो?" पलकें उठी, कोरों से पानी की कुछ बूँदें नीचे ही लुढ़कने ही वाली थी कि निशा ने चेहरे पर एकाएक मुस्कराहट लाते हुए कहा - "कुछ नहीं।" "... कुछ तो, प्लीज़ कुछ तो कहो? बताओ तो।" "... कुछ नहीं - कहा ना। क्या तुम भी मुझे चैन से जीने नहीं दोगे। मैं कुछ देर चुप रहना चाहती हूँ। इतने सालों की रिलेशनशिप में भी तुम ये नहीं समझ सके।" विनोद को जैसे ऐसे किसी जवाब की उम्मीद निशा से नहीं थी, वह अवाक् निशा के चेहरे को देखने लगा। उसने देखा उसके गाल होंठों की तरह सूखे हुए थे जैसे रात भर नमकीन द्रव्य में डूबे हों।..." प्लीज़ कुछ तो कहो..आज फैरेवल पार्टी है, कॉलेज का आखिरी दिन..कुछ तो बोलो..कुछ तो कहो.". उसने एक बार फिर कोशिश की।
निशा का शरीर जो अब तक अचेत था। एकदम हरकत में आया उसने अपने लाल पर्स से एक कार्ड निकाला और विनोद को थमाकर मालियों की मेहनत और लहराती घासों को कुचलती हुई चली गयी।
आज इतने सालों बाद भी निशा के पैरों के निशान उस जगह मौजूद है। उस बैंच पर उसका अहसास मौजूद है। उसके जेहन में हर साल सर्दियों की समाप्ति निशा के खयाल को पैदा कर देती है।

शहर में प्रेम

तेज़ हवा में अपने बालों को संभालतीं तुम दूर खड़ी थीं। मैं पास आ रहा था। पीले सूट पर सफेद चुन्नी क्या फ़ब रही है तुम पर। तारीफ़ करने पर भी तुम आग बबूला हो गयी थी। 'आज फिर लेट, तुम्हारी बात की कोई वैल्यू है या नहीं। जानते हो कितनी देर से यहाँ खड़ी हूँ, लोग ऐसे घूर रहे हैं जैसे अभी खा जाएंगे। मुझे ये सब बिल्कुल पसंद नहीं और तुम्हारा फोन , तुम्हारा फोन क्यों नहीं लग रहा।' एक साथ उसने इतने सवाल कर डाले। 
मैं उसकी आँखों में प्यार तलाश रहा था पर उनमें अजब बदहवासी और खौफ़ था।

शनिवार, 5 मई 2012

Valentine's Day

दूर वो दिखाई दी।.. उसने सोचा अब तो दे ही दूँ , पर फिर रुक गया। उसे आज ही उसके दोस्त ने कहा था कि ऐसे मामलो में जल्दबाजी ठीक नहीं। उसने फिर कंधे तक लटके बैग को पीछे किया और चेहरे पर आई बेचैनी को हटाने की कोशिश करने लगा। "कैसे दूँ वो बुरा तो नहीं मानेगी ना? कहीं दोस्ती भी ...नहीं-नहीं" उसने अपने अंदर एक और लड़के के होने का आभास महसूस किया। "दे ही देता हूँ अब नहीं दूँगा तो कब दूँगा।" वह उसके पास गया..फरवरी की धूप में वह ऐसी दिखती मानो कच्छ के रण मे पानी की चमक। उसने पास जाके थोड़ा हिचकिचाकर कहा.."एक्सक्यूज़ मी" ..
"हाँ क्या है",
 "कुछ नहीं "
वह फिर रह गया। उसे लगा यह वो लड़की नहीं जिसे वह चाहता है। बैग की चेन जो उसने खोल ली थी। बंद करके बैग कंधे पर टांग लिया। ऐसा लगता है मानो कल की ही बात हो। 
पिछले नौ सालों से आज के दिन हर बार डायरी के भीतरे छुपाये गये फूल को देख कर वह अपने कॉलेज के दिनों में खो जाता है। 

गुरुवार, 3 मई 2012

चिक्की

चिक्की के गाल पर हाथ फेरते हुए उसे ऐसा एहसास हुआ मानो यह स्पर्श महसूस किये उसे ज्यादा समय नहीं बीता। चिक्की जब मुस्कराता, हँसता,खेलता.रोता, उसके चेहरे और छातियों पर अपने हाथों से थपकी मारता, यह एहसास उसे फिर फिर होता और वह उन स्मृतियों में खो जाती जब उसने और चिक्की के पापा ने जीने मरने की क़समें साथ-साथ खाई थी। तब उसे 'हम बने तुम बने एक दूजे के लिए' फिल्मी गीत बेहद पसंद था। लेकिन समय हमारी सोच और धारणाओं के साथ साथ हमारे ख्वाबों को भी कितना बदल देता है। आज उसे अक्सर 'क्या हुआ तेरा वादा..याद है तुझको तून कहा था..' अपने दिल के अधिक करीब लगता है। आज चिक्की का जन्मदिन है। यहाँ आने से पहले उसने खुद को कितना समझाया था कि वह न जाए लेकिन जैसे उसका अपने पैरों पर बस ही न था जैसा पहले दिल पर नहीं था। पूरे रास्ते कॉलेज के दिनों की यादें उसे सालती रहीं।
चिक्की की मम्मी और उसकी दोस्ती हुए ज्यादा समय नहीं बीता है। जब उसे पता चला कि चिक्की की मम्मी अजय की ही पत्नी है, तब उसने खुद को इस सब से काटने की कोशिश भी की, लेकिन फिर रह गयी..
आज इस समय जब घर में पार्टी का माहौल है चिक्की अपनी इस नई आँटी को छोड़ने को तैयार नहीं है और वह भी कहाँ चाहती है कि चिक्की उसे छोड़े
कितना अरसा गुज़र गया है किसी को प्यार किये। आशा ने फिर धीरे से आँखे चुराते हुए चिक्की के गाल पर अपने होंठो का एक हल्का स्पर्श रख दिया। उसके गालो का स्वाद बहुत जाना पहचाना था।

बुधवार, 2 मई 2012

स्मृति में प्रेम

कॉलेज का विदाई समारोह क्या मेरे प्यार का भी आज आखिरी दिन है? उसके मन में यही सवाल था उस दिन। उसकी नज़रे उसे खोज रहीं थी पर वो जैसे कहीं नहीं थी वह फिर कैंटीन की छत से कॉलेज के कॉरिडोर की ओर भागा पर उसे वहाँ भी नहीं पाया। उसकी सहेली ने बताया कि वो कॉमन रूम में तैयार हो रही है। वह इंतजार करने लगा। फिर वह बाहर निकली साड़ी का रंग नहीं बता सकता बहुत डिफ्रेंट थी बिल्कुल उसकी आँखों की तरह। दुनिया में ऐसी आँखें किसी की नहीं थी। वो ऐसा मानता था। वह उसके सामने से गुज़र गयी। वह कुछ बोल नहीं पाया। उसके साथी खुश थे। पर क्या था जो उसके मन में चल रहा था? वह फिर उसे खोजने लगा। कॉलेज के पिछले तीन सालों में वह इतना कभी खाली नहीं हुआ जितना कि आज। उसे लगा कि दिल से कोई द्रव्य निकल रहा है उसने दिल पर हाथ रखा पर कुछ नहीं निकल रहा था वहाँ कुछ तेजी से बज सा रहा था। वह कैंटीन की छत पर गया उसने देखा कि वह रुपेश के साथ फोटो खिचवा रही थी वह बहुत खुश थी रुपेश हमारी क्लास का सबसे डैशिंग लड़का था। उस दिन उसे पहली बार लगा कि वह बेहद बदसूरत है। उसे लगा कि उसकी माँ को बचपन में उसके माथे पर काजल नहीं लगाना चाहिए था उसे पहली बार माँ से इतनी शिकायत हुई।