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सोमवार, 7 मई 2012

शहर में प्रेम

तेज़ हवा में अपने बालों को संभालतीं तुम दूर खड़ी थीं। मैं पास आ रहा था। पीले सूट पर सफेद चुन्नी क्या फ़ब रही है तुम पर। तारीफ़ करने पर भी तुम आग बबूला हो गयी थी। 'आज फिर लेट, तुम्हारी बात की कोई वैल्यू है या नहीं। जानते हो कितनी देर से यहाँ खड़ी हूँ, लोग ऐसे घूर रहे हैं जैसे अभी खा जाएंगे। मुझे ये सब बिल्कुल पसंद नहीं और तुम्हारा फोन , तुम्हारा फोन क्यों नहीं लग रहा।' एक साथ उसने इतने सवाल कर डाले। 
मैं उसकी आँखों में प्यार तलाश रहा था पर उनमें अजब बदहवासी और खौफ़ था।

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