यह लघुकथा आलोक झा के फेसबुक स्टेटस से यहाँ चस्पा की गई है। आलोक की फेसबुक वॉल पर की गई टिप्पणियों को पढ़ते हुए दिल में कुछ मचल सा जाता हैं। कुछ हैं जो उनकी टिप्पणियो में परोक्ष होकर भी प्रत्यक्षतः हमें दिखाई देता हैं। मैंने जब ये कथा पढ़ी तो मुझे शुरुआत में यह पंचतंत्र सरीखी लगी। आलोक इस लघुकथा में(मुझे पूरी उम्मीद है उन्होंने यह लघुकथा जान कर नहीं ही लिखी होगी) जिन संदर्भों पर टिप्पणी करतें हैं वो आज की लघुकथा के बेहद मौजूँ संदर्भ हैं।शार्षक आलोक ने क्योंकि नहीं दे ऱखा था था तो मुझे जैसा समझ आया मैंने दे दिया। अगर इसमें कोई ग़ुस्ताखी मानी जाए तो उसकी जिम्मेदारी मेरी होगी - मॉडरेटर
एक शार्क समुद्र से निकल कर रेत पर आराम से पड़ी है । वहीं एक नौकरशाह घूम रहा है । दोनों में बातचीत होने लगती है । कहो शार्क क्या हाल हैं तुम्हारे ? नौकरशाह मजे में हूँ । शार्क तुम किस तरह काम करती हो ? मैं सतह पर ही रहती हूँ और अपने स्तर पर ही घूमती हूँ । मैं भी ऐसा ही करता हूँ । शार्क , तुम्हारा काम करने का तरीका क्या है ? मैं लोकतांत्रिक ढंग से काम करती हूँ । मैं छोटी मछलियों से कहती हूँ कि हमारे समान अधिकार हैं । तुमलोग मुझे खाओ । वो मुझे नहीं खा पाती तब मैं कहती हूँ - अब मैं अपने अधिकार का उपयोग करती हूँ । फिर मैं उन्हें खा जाती हूँ । नौकरशाह ने कहा मैं भी ठीक ऐसा ही करता हूँ । तभी शार्क ने कहा अब मैं पानी में जाती हूँ अलविदा । नौकरशाह ने भी विदा ली ।
थोड़ी देर बाद नौकरशाह पानी में कूद पड़ा । जब निकला तो उसके दाँतों में शार्क फँसी हुई थी !
- आलोक झाथोड़ी देर बाद नौकरशाह पानी में कूद पड़ा । जब निकला तो उसके दाँतों में शार्क फँसी हुई थी !
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