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सोमवार, 2 जुलाई 2012

भूत - पूरन सिंह


              बाबा बहुत मेहनत करते थे लेकिन जमींदार बेगार तो करवाता था, पैसे नहीं देता था। कभी-कभार दे दिए तो ठीक, नहीं तो नहीं। उन्हीं पैसों से किसी तरह गुजर होती थी।
       एक दिन दोपहर को मैंने मां से कहा, ‘‘बहुत भूख लगी है।’’
       मां कुछ नहीं बोली उसने मिट्टी के बरतन उलट कर दिखा दिए थे।
       मेरी भूख और तेज हो गई थी। भूख के तेज होते ही मस्तिष्क भी तेज हो गया था। पास ही श्मशान घाट था जहां बड़े .बडे लोग अपने बच्चों को भूत-प्रेत से बचाने के लिए नारियल, सूखा गोला पूरी-खीर कई बार मिष्ठान भी रख आते थे। यह सब काम दोपहर में होता था या फिर आधी रात को।
       मैं श्मशान घाट चल दिया था। संयोग से वहां खीर पूरी और सूखा गोला रखा था। गोले पर सिंदूर और रोली लगी थी। मैंने इधर-उधर देखा। कोई नहीं था। मैंने जल्दी-जल्दी आधी खीर पूरी खा ली थी और गोला झाड़ पोंछकर अपनी जेब में रख लिया। आधी खीर पूरी लेकर मैं घर आया था। मेरा चेहरा चमक रहा था।
       चमकते चेहरे को देखकर मां ने पूछा, ‘भूख से भी चेहरा चमकता है क्या। तू इतना खुश क्यों हैं?
       मैंने बची हुई आधी खीर-पूरी माँ के आगे कर दी थी। माँ  सब कुछ समझ गई थी। माँ की आंखें छलक गई थी और उसने मुझे अपने आँचल में छिपा लिया था मानो भूत से बचा रही हो कि उसके होंठ फड़फड़ाने लगे थे, ‘भूत, भूख से बड़ा थोड़े ही होता है।
       मैं कुछ नहीं समझा था। मैं मां के आंचल में और छिपता चला गया था।

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