लघुकथा समवाय यह समूह बनाने की जरुरत शायद इसलिए भी है कि आज जैसे कहानियों के इस दौर में लघुकथाओं पर एक संकट सा आ गया जान पड़ता है।मेरी कोशिश है कि हर वो शख्स जो अपने अनुभव को कथा खासकर लघुकथा में रूपांतरित करने का हुनर जानता हैं। वह यहाँ इस ब्लॉग पर उस अनुभव को चस्पा करें। हमें अपनी लघु कथा भेजे। हमसे संपर्क करे। लेकिन इस योजना के लिए ज़रूरी है कि आप अपनी मौलिक लघुकथाएँ हमें भेजें। हमारा ईमेल आईडी है tarunguptadu@gmail.com dr.tarundu@gmail.com Mob :- 09013458181
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सोमवार, 10 दिसंबर 2012
शनिवार, 8 दिसंबर 2012
अर्धांगिनी
बचपन में मास्टर जी ने कहा - मूर्ख। जानता है मूर्ख किसे कहते है। और संटी हाथों पर जड़कर चलते बने। ये फ्लैशबैक के दिन थे। फिर बचपन खत्म हुआ और हम कॉलेज में पहुँच एकाएक जवान हो गये। असल कहानी यहाँ शुरु हुई..
हमारे पास सिवाय मान जाने के कोई चारा नहीं था। हम सब दोस्त(एक के अलावा) आखिरकार मान गये। हमने अपने दिल को समझाया और अपनी राह को एक खूबसूरत मोड़ दे दिया। पर हम परेशां थे कि ये सारे मोड़ उसी मंज़िल की ओर फिर फिर क्यों बढ़ जाते हैं जिसे हम छोड़ना चाहते है। फिर हमने तय किया कि हम इन मोड़ों को भी अपनी राहों से हटा देंगे। हालांकि हम ऐसा कर नहीं सकते थे फिर भी हमने पूरी कोशिश की। हमने भरसक कोशिश की कि हम उसे भुला दें। पर वो हमारे जहन में एक बुरे सपने की तरह हावी थी। हम उन दिनों को कोसने लगे जब हमने उसे एक सुंदर, सुशील सभ्य मानने की गुस्ताखी की थी। हमारे आने वाले दस साल इस गुस्ताखी की सजा बने। ह
हमारे पास सिवाय मान जाने के कोई चारा नहीं था। हम सब दोस्त(एक के अलावा) आखिरकार मान गये। हमने अपने दिल को समझाया और अपनी राह को एक खूबसूरत मोड़ दे दिया। पर हम परेशां थे कि ये सारे मोड़ उसी मंज़िल की ओर फिर फिर क्यों बढ़ जाते हैं जिसे हम छोड़ना चाहते है। फिर हमने तय किया कि हम इन मोड़ों को भी अपनी राहों से हटा देंगे। हालांकि हम ऐसा कर नहीं सकते थे फिर भी हमने पूरी कोशिश की। हमने भरसक कोशिश की कि हम उसे भुला दें। पर वो हमारे जहन में एक बुरे सपने की तरह हावी थी। हम उन दिनों को कोसने लगे जब हमने उसे एक सुंदर, सुशील सभ्य मानने की गुस्ताखी की थी। हमारे आने वाले दस साल इस गुस्ताखी की सजा बने। ह
मने सजा पूरी ईमानदारी से भोगी। आज सन २०१२ में जब हमारा एक दोस्त डिप्टी सुपरिटेंडेंट है हमने जानना चाहा कि हमारी गलती क्या थी? उसने फिलॉसफी झाड़ते हुए कहा गलत युग में गलत न होना भी एक गलती है। अरे ये क्या बात हुई। हाँ टोटल ईमानदारी भी अपने आप में एक बेईमानी है। ये वही दोस्त है जो एक समय हम सबमें सबसे ज्यादा निकम्मा माना जाता था। जिसके बारे में हमें लगता था कि ये तो गया इसका क्या होगा। न पढ़ता है न पढ़ने देता है। हम किताबों में डूबे रहते ये शहर की खाक़ झानता, लोगो से बतियाना इसका प्रिय शगल था। २००५ के बाद से हमारी मुलाकात नहीं हुई थी हमने भी ध्यान नहीं दिया सोचा होगा साला कहीं। फिर पिछले साल मिला हमारी गुस्ताखी को अपनी अर्धांगिनी बनाये हुए। उस दिन हमें मूर्खता की परिभाषा मालूम हुई।
ह्यूमिडिटी
वो दिन रोज की तरह नहीं था। उस दिन हवाओं में कुछ ज्यादा ही नमी थी। ऐसा मैंने अपने बचपन में भी महसूस किया था। उस दिन भी विश्वस्त सूत्रों के मुताबिक मौसम समाचारों में शहर में ह्यूमिडिटी की बहुतायत बताई गई थी लेकिन एकाएक शहर में ये ह्यूमिडिटी, ये आद्रता कैसे बढ़ गई इसका जवाब उनके पास भी नहीं था। वे सोच में मग्न थे कि हम इसका कयास तक कैसे नहीं लगा सके? चीज़े एकदम से बदल गई थी कुछ लोग दुखी थे लेकिन चेहरे पर सुख का लबादा चिपकाये थे बहुत सारे लोग खुश थे लेकिन चेहरे को दुखनुमा बनाये थे। कुछ लोग और थे जो न तो खुश थे न दुखी। वे खुश और दुखी दिखने के चुनाव में फँसे हुए थे। सन् १९९२ के बाद से हर बार दिसंबर की ये सर्द सुबह ऐसे ही नमी लिए आती है। इस नमी की तारीखें अब दिनों दिन बढ़ने लगीं है साथ ही तीसरे दर्जे के कुछ लोगों की तादात भी दिनोंदिन बढ़ रही है। कुछ लोगों के लिए ये तारीख़ एक वाकया है। कुछ के लिए एक घटना-परिघटना-दुर्घटना। तो कुछ के लिए किसी महापुरुष का परिनिर्माण दिवस। मेरे लिए ये दिन मेरे बचपन के साथी अफसाना और फिरोज़ की विदाई का दिन है। क्योंकि इसी दिन की दोपहर के बाद उनके पिता ने एक हिंदु बहुल इलाके को छोड़ने का फैसला लिया।
मंगलवार, 18 सितंबर 2012
सियासी लप्रेक
नीलिमा ! हां निखिल. तुमने सुना आज एनडीटीवी पर रामविलास ने क्या कहा ? क्या कहा ? कहा कि जो अन्तर्जातीय विवाह करते हैं, उनके बच्चे को रिजर्वेशन मिलता है तो उससे जाति टूट जाएगी..तो मतलब ये कि लोग बच्चों का भविष्य बेहतर करने के लिए प्रेम करने लगेंगे ? प्रेम का इतना खूबसूरत निवेश निखिल..मतलब हमारे बच्चे भी ? लेकिन हमने ये सोचकर तो प्रेम नहीं किया न नीलिमा. हमने तो बस इसलिए प्रेम किया क्योंकि हमदोनों एक-दूसरे को पसंद करते हैं. हमारी सोच मिलती है. हमने तो कभी ये दावा नहीं किया कि हम प्रेम करके जाति व्यवस्था तोड़ रहे हैं..हम तो बस प्रेम कर रहे थे.अब पीछे क्या टूट रहा है क्या बन रहा है इसकी व्याख्या का काम तो सत्ता में बैठे लोगों का है न. लेकिन तुम बताओ निखिल, अगर सचमुच ऐसा हो जाए तो तुम उसे कैसे लोगे ? मेरा मतलब है उर्मि/ अव्यव को इसका लाभ लेने दोगे ? आखिर जाति के बंधन तोड़क
र प्रेम और शादी करने में भी तो हमें उतनी ही तकलीफ हुई और आगे होगी न जितनी कि एक दलित को दलित बच्चे को जन्म देने और परवरिश करने में होती है ? हम ऐसा करते हुए उंची जाति के होकर भी तो उसी तरह बहिष्कृत कर दिए जाएंगे न, अपने समाज से काट दिए जाएंगे ? उर्मि/ अवयव को कितनी जिल्लत उठानी होगी ? नाना,दादा सब किताबों तक होंगे. नीलिमा, क्या हमारा प्रेम इतना सियासी हो जाएगा कि समाजशास्त्र के सारे पाठ इसी से खुलेंगे और लिखे जाएंगे ? तुम कैसी-कैसी बातें कर रही हो ? फॉर गॉड सेक, तुम उसमें अभी के लिए कुछ ग्राम छायावाद के नहीं डाल सकती ? तुमने बाबा नागार्जुन की सिंदूर तिलकित भाल कविता तो पढ़ी होगी, उसे याद नहीं कर सकती ? हमने जो फैसला अपनी खुशी के लिए लिया, वो आनेवाली पीढ़ी के लिए निहायत एक स्वार्थ में लिया गया फैसला समझा जाएगा ? मुझे डर लग रहा है नीलिमा, हमारे इस खूबसूरत संबंधों के बीच समाज की दीवारें तो आएगी, ये जानता था लेकिन उन दीवारों में संसद की ईंटें भी चुनवायी जाएगी, सपने में भी नहीं सोचा था..उर्मि, तुम जब भी इस दुनिया में आना, सिर्फ प्रेम करना, अपने उस प्रेम को संसद के गलियारों की गूंज न बनने देना. अवयव, तुम यकीन तो कर सकोगे न कि हमने एक औलाद की सुविधाएं जुटाने के लिए प्रेम नहीं किया था ? प्रेम किया था क्योंकि ये दुनिया की सबसे खूबसूरत चीज है.( सियासी लप्रेक )
प्रेम गली नहीं सांकरी - माया मृग
"तुमने कहा, "कहां गया वो पहले वाला प्यार...वो प्रेम...।"
पता नहीं.....उलाहना दे रही हो कि रखे की जगह पूछ रही हो....
....मुझे क्या पता तुम ही रख देती हो सब कुछ इधर उधर कहीं....। बीच रास्ते कहीं गिर ना गया हो...ठहरो, देख आता हूं...जिस रास्ते से आता है, उसी से लौट भी जाता है कई बार....कहीं कोई पैरों का निशान भर दिख जाए....बस...ढूंढ लूंगा...। अच्छा एक बार वो आला देख लेती....उस खिड़की के पास, जहां से तुम आते-जाते देखा करती थीं मुझे....हो सकता है मैंने ही कहीं देखा हो....मैं भी तो चीजें रखकर भूल जाता हूं आजकल....."
(माया मृग की वॉल से साभार)
पूरी संभावना है कि यह वक्तव्य माया मृग जी ने लघुकथा के रूप में न लिखें हों, लेकिन मुझे इमें एक लघुकथा दिखी सो यहाँ चेप दी। बाकि का हक़ आपका। - तरुण
पूरी संभावना है कि यह वक्तव्य माया मृग जी ने लघुकथा के रूप में न लिखें हों, लेकिन मुझे इमें एक लघुकथा दिखी सो यहाँ चेप दी। बाकि का हक़ आपका। - तरुण
बुधवार, 29 अगस्त 2012
बा॰ल॰क॰= बाल लघु कथा
बा॰ल॰क॰= बाल लघु कथा
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चल उठ। नाश्ता कर। बाल सँवार। वर्दी पहन। स्कूल जा। सबसे अच्छे नंबर ला। बड़ा आदमी ( डॉक्टर, इंजीनियर , आई ए एस आदि ) बन। राजा बेटा। सो जा।
चल उठ। कर ले नाश्ता। भाई को कराया? तू भी चली जा न स्कूल वैसे ... । कुछ सीख उससे । खाना बना। बर्तन माँज। चल सो भी जा अब। टी वी देखेंगी रानी साहिबा !!!
Dil, Dosti, etc in बारिश
अरे नीर,तुम अचानक ? फोन पर बताया नहीं कि तुम आ रहे हो ? और तुम तो बुरी तरह भीग गए..जींस से इतना पानी टपक रहा है..रुको मैं अभी तुम्हारे लिए कपड़े लेकर आती हूं..लेकिन तुम्हें तो मेरे कपड़े आएंगे नहीं..आइडिया ! खादी का कुर्ता-पायजामा.आ जाएगा तुम्हें..अभी लाती हूं..नीलिमा कपड़े लाने दूसरे कमरे चल देती है..जब तक कपड़े लेकर वापस आती तब तक नीर अपना काम कर चुका था. ये क्या पागलपंथी है नीर ? तुमने मेरी पोल्का डॉटवाली लोअर पहन ली और ये टीशर्ट. टीशर्ट पहनते वक्त पढ़ा भी तुमने कि इस पर क्या लिखा है ? पागल तो नहीं हो. इसे पहनकर मेट्रो से वापस अपने घर जाओगे? लोग हंसेंगे नहीं कि ये कौन लड़का है जो स्कीनी पोल्का डॉट लोअर में, लड़की के कपड़े में घूम रहा है. अरे नहीं, कुछ नहीं कहेंगे. किसकी मजाल है कि मुझे कोई कुछ कह दे. फिर कह भी दिया तो कह दूंगा- लड़की के कपड़े नहीं
पहने हैं मिस्टर, इसी बहाने एक चुटकी नीलिमा को अपने साथ लेकर घूम रहा हूं और अगर लड़कियों ने ठहाके लगाए या एटीट्यूड में स्माइल पास की तो जोर से कहूंगा- जलन होती है देखकर ? तेरे उन घोंचू, बकरे सी दाढ़ी रखनेवाले से तो अच्छी ही दिख रहा हूं. और पढ़ लिया क्या लिखा है- इट्स माइ शो.वैसे एक बात कहूं, तुम्हें इस तरह की चीजें लिखी टीशर्ट नहीं पहननी चाहिए..इट्स माइ शो..आखिर तुम खुद अपने को मेल चावइज्म की कॉमडिटी बताती हो.
..बस-बस रहने दो. अब नुक्कड नाटक की रिहर्सल यही मत करने लगो. लेकिन तुम्हें पता है ये लोअर और टीशर्ट मैं पहले दो बार पहन चुकी हूं और धोने के लिए इसे खूंटी पर टांग रखी थी. नीर बिना कुछ बोले ड्रेसिंग टेबल की तरफ बढ़ता है और स्पिंज को इतनी जोर से दबाता है कि एक बूंद भी डियो उसके भीतर न रहे..लो अब तो कोई नहीं कहेगा न कि एक तो लड़की के कपड़े पहन लिए और उपर से इतने गंदे की स्मेल आ रही है. अरे पागल, ये तो उससे भी ज्यादा नौटंकी हो गई..कपड़े के साथ-साथ डियो भी लड़की की ? आखिर तू चाहता क्या है, रुक जाता दो मिनट तो क्या बिगड़ जाता ? मैं तो कुर्ता पायजामा ला रही थी न ? कुछ भी तो नहीं. बस ये कि मैं इस इलाके से गुजर रहा था तो इतनी तेज बारिश होने लगी कि मुझे समझ नहीं आया कि क्या करुं? पिछले दो घंटे से भीग रहा था. मन में आया कि कुछ कामचलाउ कपड़े लेकर किसी रेस्तरां के वाशरुम जाकर बदल लूं लेकिन फिर तुम्हारा ध्यान आया कि अरे नीलिमा भी तो इधर ही रहती है,वहीं चलते हैं. यकीन मानो, जब तुम्हारे यहां चलने का मन बनाया तो दिमाग में ये बात बिल्कुल नहीं थी कि अगर तुम्हारा ब्ऑयफ्रैंड होगा तो इसे किस तरह से लेगा? मेरे दिमाग में ये भी नहीं आया कि अगर तुम्हारी खूसट मकान मालकिन ने दूसरे कपड़े में बाहर निकलते देख लिया तो क्या सोचेगी ? मैं तो बस ये सोच रहा था कि निखिल की कोई न कोई टीशर्ट और लोअर तो होगी ही, पहन लूंगा..कौन पैसे फसाए..नहीं तो तुम्हारी ही जिंदाबाद. मुझे तुम्हारे लड़की होने के पहले दोस्त होने का ख्याल आया और मैं बस चला आया. एनीवे,मैं ये तुम्हारे कपड़े लौटा दूंगा या फिर उस बारिश और मौके का इंतजार करुंगा जब तुम फोन करके कहोगा- यार नीर ! मेरे कपड़े होंगे न तेरे पास..देख न आज मैं इधर जंगपुरा आयी थी और बारिश में बुरी तरह फंस गई.( बरसाती लप्रेक विद दिल,दोस्ती, एटसेट्रा)
पहने हैं मिस्टर, इसी बहाने एक चुटकी नीलिमा को अपने साथ लेकर घूम रहा हूं और अगर लड़कियों ने ठहाके लगाए या एटीट्यूड में स्माइल पास की तो जोर से कहूंगा- जलन होती है देखकर ? तेरे उन घोंचू, बकरे सी दाढ़ी रखनेवाले से तो अच्छी ही दिख रहा हूं. और पढ़ लिया क्या लिखा है- इट्स माइ शो.वैसे एक बात कहूं, तुम्हें इस तरह की चीजें लिखी टीशर्ट नहीं पहननी चाहिए..इट्स माइ शो..आखिर तुम खुद अपने को मेल चावइज्म की कॉमडिटी बताती हो.
..बस-बस रहने दो. अब नुक्कड नाटक की रिहर्सल यही मत करने लगो. लेकिन तुम्हें पता है ये लोअर और टीशर्ट मैं पहले दो बार पहन चुकी हूं और धोने के लिए इसे खूंटी पर टांग रखी थी. नीर बिना कुछ बोले ड्रेसिंग टेबल की तरफ बढ़ता है और स्पिंज को इतनी जोर से दबाता है कि एक बूंद भी डियो उसके भीतर न रहे..लो अब तो कोई नहीं कहेगा न कि एक तो लड़की के कपड़े पहन लिए और उपर से इतने गंदे की स्मेल आ रही है. अरे पागल, ये तो उससे भी ज्यादा नौटंकी हो गई..कपड़े के साथ-साथ डियो भी लड़की की ? आखिर तू चाहता क्या है, रुक जाता दो मिनट तो क्या बिगड़ जाता ? मैं तो कुर्ता पायजामा ला रही थी न ? कुछ भी तो नहीं. बस ये कि मैं इस इलाके से गुजर रहा था तो इतनी तेज बारिश होने लगी कि मुझे समझ नहीं आया कि क्या करुं? पिछले दो घंटे से भीग रहा था. मन में आया कि कुछ कामचलाउ कपड़े लेकर किसी रेस्तरां के वाशरुम जाकर बदल लूं लेकिन फिर तुम्हारा ध्यान आया कि अरे नीलिमा भी तो इधर ही रहती है,वहीं चलते हैं. यकीन मानो, जब तुम्हारे यहां चलने का मन बनाया तो दिमाग में ये बात बिल्कुल नहीं थी कि अगर तुम्हारा ब्ऑयफ्रैंड होगा तो इसे किस तरह से लेगा? मेरे दिमाग में ये भी नहीं आया कि अगर तुम्हारी खूसट मकान मालकिन ने दूसरे कपड़े में बाहर निकलते देख लिया तो क्या सोचेगी ? मैं तो बस ये सोच रहा था कि निखिल की कोई न कोई टीशर्ट और लोअर तो होगी ही, पहन लूंगा..कौन पैसे फसाए..नहीं तो तुम्हारी ही जिंदाबाद. मुझे तुम्हारे लड़की होने के पहले दोस्त होने का ख्याल आया और मैं बस चला आया. एनीवे,मैं ये तुम्हारे कपड़े लौटा दूंगा या फिर उस बारिश और मौके का इंतजार करुंगा जब तुम फोन करके कहोगा- यार नीर ! मेरे कपड़े होंगे न तेरे पास..देख न आज मैं इधर जंगपुरा आयी थी और बारिश में बुरी तरह फंस गई.( बरसाती लप्रेक विद दिल,दोस्ती, एटसेट्रा)
..बस-बस रहने दो. अब नुक्कड नाटक की रिहर्सल यही मत करने लगो. लेकिन तुम्हें पता है ये लोअर और टीशर्ट मैं पहले दो बार पहन चुकी हूं और धोने के लिए इसे खूंटी पर टांग रखी थी. नीर बिना कुछ बोले ड्रेसिंग टेबल की तरफ बढ़ता है और स्पिंज को इतनी जोर से दबाता है कि एक बूंद भी डियो उसके भीतर न रहे..लो अब तो कोई नहीं कहेगा न कि एक तो लड़की के कपड़े पहन लिए और उपर से इतने गंदे की स्मेल आ रही है. अरे पागल, ये तो उससे भी ज्यादा नौटंकी हो गई..कपड़े के साथ-साथ डियो भी लड़की की ? आखिर तू चाहता क्या है, रुक जाता दो मिनट तो क्या बिगड़ जाता ? मैं तो कुर्ता पायजामा ला रही थी न ? कुछ भी तो नहीं. बस ये कि मैं इस इलाके से गुजर रहा था तो इतनी तेज बारिश होने लगी कि मुझे समझ नहीं आया कि क्या करुं? पिछले दो घंटे से भीग रहा था. मन में आया कि कुछ कामचलाउ कपड़े लेकर किसी रेस्तरां के वाशरुम जाकर बदल लूं लेकिन फिर तुम्हारा ध्यान आया कि अरे नीलिमा भी तो इधर ही रहती है,वहीं चलते हैं. यकीन मानो, जब तुम्हारे यहां चलने का मन बनाया तो दिमाग में ये बात बिल्कुल नहीं थी कि अगर तुम्हारा ब्ऑयफ्रैंड होगा तो इसे किस तरह से लेगा? मेरे दिमाग में ये भी नहीं आया कि अगर तुम्हारी खूसट मकान मालकिन ने दूसरे कपड़े में बाहर निकलते देख लिया तो क्या सोचेगी ? मैं तो बस ये सोच रहा था कि निखिल की कोई न कोई टीशर्ट और लोअर तो होगी ही, पहन लूंगा..कौन पैसे फसाए..नहीं तो तुम्हारी ही जिंदाबाद. मुझे तुम्हारे लड़की होने के पहले दोस्त होने का ख्याल आया और मैं बस चला आया. एनीवे,मैं ये तुम्हारे कपड़े लौटा दूंगा या फिर उस बारिश और मौके का इंतजार करुंगा जब तुम फोन करके कहोगा- यार नीर ! मेरे कपड़े होंगे न तेरे पास..देख न आज मैं इधर जंगपुरा आयी थी और बारिश में बुरी तरह फंस गई.( बरसाती लप्रेक विद दिल,दोस्ती, एटसेट्रा)
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